त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्ड ज्ञानस्य साधनं मुख्यं देवतानुग्रहः परः । यः सर्वभावतः स्वात्मदेवतामुपसङ्गतः ॥ ७ ॥ तस्य ज्ञानं सुसुलभं भवतीति विनिश्चयः । एतत् सर्वोत्तमं राम प्रोक्तं ज्ञानस्य साधनम् ॥ ८ ॥ अन्यानपेक्षमेतत्तु फलसंसाधने क्षमम् । एतद्विहायान्यदत्र न सम्यक् फलदं भवेत् ॥ ९ ॥ शृण्वत्र कारणं राम सकारणमिदं भवेत् । विज्ञानं केवलचितिर्या सर्वस्यावभासिका ॥ १० ॥ तस्यावभासरूपायाः कल्पितावरणन्तु यत् । विचारात्तदपोहेन तत् स्वरूपोपलक्षणम् ॥ ११ ॥ तच्चान्येषां बहिर्भावतत्पराणां सुदुर्लभम् । भक्तानामन्यपरताहानेन तत्परत्वतः ॥ १२ ॥ सुलभं शीघ्रसम्प्राप्यं भवत्येव सुनिश्चितम् । परमात्मदेवका परम अनुग्रह ज्ञानका मुख्य साधन है। जो पुरुष सम्पूर्ण भावसे परमात्मदेवकी शरण ग्रहण करता है उसे ज्ञान सुलभ हो जाता है—यह बात निश्चित है। अतः परशुराम ! यही ज्ञानका सर्वोत्तम साधन कहा है ॥ ७-८ ॥ यह साधन किसी अन्य साधनकी सहायताके बिना ही ज्ञानका फल प्राप्त करानेमें समर्थ है। और यदि यह न हो तो अन्य कोई साधन ठीक-ठीक फल प्रदान नहीं कर सकता ॥ ६ ॥ इसका जो कारण है वह सुनो, क्योंकि यह बात सकारण है। वास्तवमें ज्ञान शुद्ध चेतन ही है, जो सभीका प्रकाशक है ॥ १० ॥ उस प्रकाशरूप चेतनका जो कल्पित आवरण है, विचार द्वारा उसकी निवृत्ति हो जानेपर उसका स्वरूप लक्षित हो जाता है ॥ ११ ॥ किन्तु अन्य साधकोंको, जो कि बाह्य व्यापारोंमें लगे रहते हैं, ऐसा होना बहुत कठिन है। भक्तोंमें तो अन्यपरायणता होती नहीं और वे भगवत्परायण भी होते ही हैं, इसलिये उनको वह शीघ्र और सुगमतासे प्राप्त हो सकता है—यह बात सर्वथा निश्चित है ॥ १२-१३ पू० ॥