त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः । ३३१ देवतातत्परस्त्वेव भूत्वा स्वल्पान्यसाधनः ॥ १३ ॥ ज्ञात्वा कथञ्चिदात्मानमन्यान् प्रति निरूपयेत् । निरूपयन् सदा राम समावेशं समाप्नुयात् ॥ १४ ॥ एवं निरूपणाद्यैस्तु समावेशे दृढे सति । शिवतामाप्य तच्चित्तं हर्षोद्वेगविवर्जितम् ॥ १५ ॥ यत्र यत्र व्रजति तत् सर्वं तच्छिवसात्कृतम् । करोत्युत्तमविज्ञानी जीवन्मुक्तपदस्थितः ॥ १६ ॥ तस्मात् सुभक्तियोगेनान्येभ्यो भूयो निरूपणम् । श्रेष्ठं साधनमेतत्तु नान्यदेतत्समं भवेत् ॥ १७ ॥ भक्त्या निरूपणसमं न भवेदन्यसाधनम् । ज्ञानिनां लक्षणं राम दुर्विज्ञेयं भवेत् खलु ॥ १८ ॥ यतः सर्वान्तरं तत्तु नेत्रवागाद्यगोचरम् । न निरूपयितुं शक्यं लक्षितुं वा परैः क्वचित् ॥ १९ ॥ पर जो ईश्वरपरायण है वह यदि वैराग्यादि अन्य साधनोंका भी थोड़ा आश्रय ले और किसी प्रकार उस तत्त्वको जानकर फिर अन्य साधकोंके प्रति सर्वदा उसका निरूपण करता रहे तो उसके साथ तदाकारता प्राप्त कर लेता है ॥ १३ उ०-१४ ॥ इस प्रकारके निरूपण आदिसे जब उसकी तद्रूपता सुदृढ हो जाय तो वह शिवत्व प्राप्त करके हर्ष-शोकादिसे रहित हो उसीमें चित्त रखकर जहाँ-जहाँ भी जाता है उस सबको वह शिवसे अभिन्न ही कर लेता है । इस प्रकार उत्तम ज्ञानी हो वह जीवन्मुक्त पदपर स्थित हो जाता है ॥ १५-१६ ॥ अतः अत्यन्त भक्तिपूर्वक अन्य जिज्ञासुओंके प्रति बार-बार आत्म- तत्त्वका निरूपण करना—यही श्रेष्ठ साधन है, इसके समान और कोई साधन नहीं है । सचमुच भक्तिपूर्वक निरूपण करनेसे बढ़कर और कोई साधन नहीं है ॥ १७-१८ पू० ॥ परशुराम ! ज्ञानियोंके लक्षणों को जानना तो निश्चय ही अत्यन्त कठिन है, क्योंकि उनका वास्तविक स्वरूप तो सभीसे आन्तर तथा नेत्र और वाणी आदि इन्द्रियोंका अविषय होता है । दूसरोंके द्वारा उसका निरूपण एवं दर्शन होना कभी सम्भव नहीं है ॥ १८ उ०-१९ ॥