त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथा शास्त्रज्ञता लोके त्वन्यैर्न ज्ञायते क्वचित् । देहवस्त्रभूषणाद्यैरेवमन्यैर्न वेद्यते ॥ २० ॥ विद्वत्ता हि स्वसंवित्तिमात्रवेद्या न चान्यथा । यथा संस्वादितरसरसज्ञत्वं हि भार्गव ॥ २१ ॥ तथापि चतुरैर्विद्यावद्भिस्तद्भाषणादिभिः । वेद्यते हि यथा स्वस्य मार्गः सूक्ष्मपिपीलिकैः ॥ २२ ॥ सन्ति स्थूललक्षणानि त्वनेकान्तानि तानि तु । सूक्ष्मलक्ष्मणि चान्यानि दुर्विज्ञेयानि वै परैः ॥ २३ ॥ निरूपणं भाषणञ्च साधनाभिनयस्तथा । ज्ञानिनामिव चान्यैस्तु कर्तुं शक्यो हि लक्ष्यते ॥ २४ ॥ अनिर्मलान्तःकरणैरभ्यस्तं ज्ञानसाधनम् । स्थिरीभवति यत्तेषां लक्षणं तत् प्रकीर्तितम् ॥ २५ ॥ जिस प्रकार लोकमें किसीका शास्त्र-ज्ञान भी देह, वस्त्र या आभूषणादिके द्वारा दूसरोंको कभी मालूम नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानका भी दूसरोंको पता नहीं लगता ॥ २० ॥ परशुराम ! जिसने मधुरादि रसका आस्वादन किया है उसका रसका ज्ञान जैसे उसे ही होता है, वैसे ही तत्त्वज्ञता भी केवल आत्मानुभवसे ही जानी जा सकती है, और किसी प्रकार नहीं ॥ २१ ॥ तो भी जिस प्रकार नन्हीं-नन्हीं चीटियाँ अपने रास्तेका पता लगा लेती हैं उसी प्रकार चतुर और विद्वान् पुरुष ज्ञानियोंके भाषण आदिसे उनको पहचान लेते हैं ॥ २२ ॥ यों तो शास्त्रोंमें उनके शान्ति आदि अनेकों स्थूल लक्षण बतलाये गये हैं, परन्तु वे केवल उन्हीं में पाये जायें—ऐसी बात नहीं है। इसी प्रकार अनेकों सूक्ष्म लक्षण भी हैं, किन्तु उन्हें दूसरे लोग जान नहीं सकते ॥ २३ ॥ यह देखा जाता है कि ज्ञानियोंका-सा निरूपण, भाषण और साधनोंका-सा अभिनय दूसरे लोग भी कर सकते हैं ॥ २४ ॥ जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है वे भी यदि ज्ञानके किसी साधनका अभ्यास करते हैं तो वह उनमें स्थिर हो जाता है और वही उनका लक्षण कहा जाता है ॥ २५ ॥