त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः। ३३३ यस्य मानापमानौ च लाभालाभौ जयाजयौ। नैपद्विशेषितुं शक्तौ विद्यात्तं ज्ञानिपृत्तमम् ॥ २६ ॥ स्वात्मानुभववार्त्तासु पृष्टो गूढार्थमप्युत । असन्दिग्धः प्रतिवदेज्झटिति ज्ञानिपूत्तमः ॥ २७ ॥ यस्योत्साहो भवेज्ज्ञानं वार्त्तास्ववितरां किल । निरूपणे ह्यवैमुख्यं ज्ञानिनो लक्षणं हि तत् ॥ २८ ॥ अनारम्भः स्वभावेन सन्तोषः शुचिचित्तता । महापत्स्वपि शान्तात्मा स भवेज्ज्ञानिपूत्तमः ॥ २९ ॥ एतदादीनि लक्ष्माणि भार्गवोत्तमज्ञानिनाम् । स्वात्मनस्तु परीक्षायां सुस्थिराणि न संशयः ॥ ३० ॥ साधकस्तु सदा स्वात्मपरीक्षातत्परो भवेत् । यथा परीक्षणेऽन्यस्य निपुणः संप्रवर्त्तते ॥ ३१ ॥ तथा परीक्षन् स्वात्मानं सिद्धिं न कथमाप्नुयात् । मान, अपमान, लाभ-हानि और जय-पराजय जिसके चित्तमें कोई अन्तर नहीं डाल पाते उसे ज्ञानियोंमें उत्तम समझना चाहिये ॥ २६ ॥ यदि आत्मानुभवके विषयमें कोई गूढ प्रश्न किया जाय और वह निःसन्देह होकर तत्काल उसका उत्तर दे दे तो वह ज्ञानियोंमें उत्तम है ॥ २७ ॥ ज्ञानचर्चामें जिसे अत्यन्त उत्साह हो और उसका निरूपण करनेसे जो पीछे न हटे—यह भी उसके ज्ञानी होनेका ही लक्षण है ॥ २८ ॥ जिसमें स्वभावसे ही कोई प्रवृत्ति आरम्भ करनेकी रुचि न हो, सन्तोष और पवित्र-चित्तता हो तथा अत्यन्त आपत्तिके समय भी जो शान्तचित्त रहे, वह ज्ञानियोंमें उत्तम है ॥ २९ ॥ भृगुश्रेष्ठ ! इसी प्रकार ज्ञानियोंके और भी कुछ लक्षण हैं। किन्तु यह निश्चय है कि वे अपनी परीक्षामें ही सुस्थिर (अन्यभि- चारी) हैं ॥ ३० ॥ साधकको तो सर्वदा अपने चित्तकी परीक्षामें ही तत्पर रहना चाहिये। वह जिस प्रकार दूसरों की परीक्षामें बड़ा निपुण होकर लगा रहता है उसी प्रकार यदि अपनी परीक्षा करता रहे तो कैसे सिद्धि प्राप्त न करेगा ॥ ३१-३२ पू० ॥