त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यदान्यगुणदोषाणामविचारणतत्परः ॥ ३२ ॥ स्वीयानां गुणदोषाणां विचारपरमो भवेत् । तदा सर्वसाधनानां प्राप्त्या सिद्धिमुपेष्यति ॥ ३३ ॥ एवं प्रोक्तानि लक्ष्माणि ज्ञानिनां भृगुनन्दन । स्वात्मनस्तु परीक्षायामुपयुक्तानि सर्वथा ॥ ३४ ॥ अन्येषान्तु परीक्षायामनेकान्तान्यमूनि तु । यतो ये ज्ञानिनोऽत्यन्तशुद्धस्वान्ता भृगूद्वह ॥ ३५ ॥ तेषामापातसंसिद्धसाधनैः सिद्धिरास्थिता । अतः पूर्ववासनानुरोधव्यापारतत्पराः ॥ ३६ ॥ कथं परीक्षणीयास्ते सामान्यव्यवहारिणः । ज्ञानिनस्तु तत्परीक्षां कुर्युरभ्यासवैभवात् ॥ ३७ ॥ आपातदर्शनादेव यथा रत्नपरीक्षकाः । मन्दज्ञानवतां देहसंस्था मूढसमैव हि ॥ ३८ ॥ जिस समय वह दूसरोंके गुण-दोषोंके विचारमें न लगकर अपने ही गुणदोषोंकी छान-बीनमें लग जायगा, उस समय वह सभी साधनोंको प्राप्त करके सिद्धि प्राप्त कर लेगा ॥ ३२ उ०-३३ ॥ भृगुनन्दन ! इस प्रकार यहाँ जो ज्ञानियोंके लक्षण कहे हैं वे सर्वथा अपने चित्तकी परीक्षामें ही उपयोगी हैं ॥ ३४ ॥ किन्तु दूसरोंकी परीक्षामें तो वे व्यभिचारी ( सर्वदा उपयोगी न होनेवाले ) ही हैं, क्योंकि भृगुनन्दन ! जो ज्ञानी अत्यन्त शुद्ध चित्तवाले होते हैं उन्हें आरम्भिक अवस्थावाले साधनोंसे ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ ३५-३६ पू० ॥ अतः वे अपनी पूर्व-वासनाओंके अनुसार व्यापारमें लगे रहते हैं। उन सामान्य व्यवहारियोंकी परीक्षा तुम कैसे कर सकोगे ? उनकी परीक्षा तो अपने अभ्यासके सामर्थ्यसे ज्ञानी लोग ही करेंगे, जिस प्रकारकी रत्नोंकी परीक्षा करनेवाले उसे देखते ही पहचान लेते हैं ॥ ३६ उ०-३८ पू० ॥ मन्द ज्ञानियोंके देहकी स्थिति तो अज्ञानियोंके समान ही होती