भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 349

एकविंशतितमोऽध्यायः । ३३५ यतो न तेषां सहजसमाधिप्राप्तिरस्ति हि । यावद्विमर्शनपरास्तावत्ते पूर्णरूपिणः ॥ ३९ ॥ यदा विचारविमुखास्तदा देहमयत्वतः । सुखदुःखजुषोऽत्यन्तं पशुतुल्यतया स्थिताः ॥ ४० ॥ मध्ये मध्ये पूर्णदशासादनान्निर्वृता अपि । तेषां या सा पशुदशा सद्विमर्शान्तरालगा ॥ ४१ ॥ न बन्धनाय भवति दग्धरज्जुरिव स्थिता । लाक्षारसैर्यदा वस्त्रप्रान्तयुग्मं सुरञ्जितम् ॥ ४२ ॥ व्याप्या वासोमध्यमपि सर्वं लाक्षारुणं भवेत् । एवं तस्य व्यवहृतिश्चिद्विमर्शनमध्यगा ॥ ४३ ॥ चिद्रूपात्मैकतां याता न ततो बन्धनाय सा । मध्यविज्ञानिनां देहसंयोगो नास्ति सर्वथा ॥ ४४ ॥ है, क्योंकि उन्हें सहज-समाधि प्राप्त नहीं होती ॥ ३८ उ०--३९ पू० ॥ जबतक वे विचारमें लगे रहते हैं तबतक तो पूर्णस्वरूप ही होते हैं, किन्तु जब विचारोन्मुख नहीं होते तो देहाध्यासयुक्त रहनेके कारण अत्यन्त सुख-दुःख अनुभव करनेके कारण पशुके समान रहते हैं ॥ ३९ उ०-४० ॥ बीच-बीचमें पूर्णदशा आते रहनेसे शान्तिका अनुभव करते रहनेपर भी उस सद्विचारके मध्यमें उन्हें जो पशुदशा प्राप्त होती है वह जली हुई रस्सीके समान होनेके कारण उनके बन्धनका कारण नहीं होती ॥ ४१--४२ पू० ॥ जब कि वस्त्रके दोनों सिरे लाखके रससे रँग दिये जाते हैं तो रंगके फैल जानेसे वस्त्रका सारा मध्य भाग भी लाखकी लालीसे व्याप्त हो जाता है ॥ ४२ उ०--४३ पू० ॥ इसी प्रकार चित्स्वरूप परमात्माका चिन्तन करते हुए बीचमें उसका जो व्यवहार होता है वह भी चित्स्वरूपसे अभिन्न हो जाता है, इसलिये उसके बन्धन का कारण नहीं बनता ॥ ४३ उ०--४४ पू० ॥ मध्यम ज्ञानियोंको देहका संयोग बिलकुल नहीं रहता । बुद्धिमान् पुरुष देहमें आत्मबुद्धिको ही देहका संयोग कहते हैं ॥ ४४ उ०--४५ पू०॥ परशुरामजी ! वह देहसंयोग मध्यम विज्ञानीको कभी नहीं होता,