त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे देहात्मत्वग्रहो देहसंयोगः प्रोच्यते बुधैः । स नास्ति मध्यविज्ञानवतो राम कदाचन ॥ ४५ ॥ अभ्यासातिशयात्तस्य मनो लीनं हि सर्वदा । सदा समाहितस्वान्तो व्यवहारो न तस्य हि ॥ ४६ ॥ यो देहयात्रानिर्वाहः सोऽपि तस्य सुषुप्तिवत् । यथा कश्चित् सुषुप्तिस्थो वासनामात्रतः क्वचित् ॥ ४७ ॥ किञ्चिदुक्त्वा च कृत्वा च न पश्चाद्वेद किञ्चन । यथा च मदिरामत्तो वदन् कुर्वन्न वेद वै ॥ ४८ ॥ एवमेष महायोगी लोकयात्राबहिर्गतः । किञ्चित् कदाचित् कुर्वंश्च न विजानाति तत् पुनः ॥ ४९ ॥ प्रारब्धवासनाभ्यां तु स देहो निर्वहेत् सदा । यस्तूत्तमः स विज्ञानी देहस्तस्यापि नास्ति हि ॥ ५० ॥ व्यवहारं करोत्येष रथसारथिवत् स्थितः । क्योंकि अभ्यासकी अधिकताके कारण उसका मन सर्वदा लीन रहता है ॥ ४५ उ०--४६ पू० ॥ जिस समय उसका अन्तःकरण समाधिस्थ रहता है उस समय उसका कोई व्यवहार ही नहीं रहता । उसकी जो देहयात्राका निर्वाह होता है वह भी उसकी सुषुप्तिके समान ही है ॥ ४६ उ०--४७ पू० ॥ जिस प्रकार कोई सोया हुआ पुरुष पूर्ववासनाओंके अनुसार कभी कुछ बोल या कर बैठता है तो भी पीछे उसे कुछ पता नहीं रहता ॥ ४७ उ०--४८ पू० ॥ जिस तरह मदिरासे उन्मत्त हुआ पुरुष कुछ बोले या करे तो उसे उसका पता नहीं चलता, उसी तरह लौकिक व्यवहारसे दूर रहनेवाला यह महायोगी कभी कुछ करता भी है तो पीछे उसका पता नहीं रहता ॥ ४८ उ०--४९ ॥ वह प्रारब्ध और वासनाओं (पूर्वाभ्यासों) के कारण ही सर्वदा शरीरका निर्वाह करता है । किन्तु जो उत्तम ज्ञानी होता है देह तो उसकी दृष्टिमें भी नहीं होता, किन्तु वह रथके सारथीकी तरह स्थित होकर सारा व्यवहार करता है ॥ ५०--५१ पू० ॥