त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः ३३७ यथा रथेन व्यापारं कुर्वन्न रथदेहकः ॥ ५१ ॥ सारथिः स्यादेवमेव देहव्यापारतत्परः । न देही नापि व्यापारी शुद्धसंवेदनात्मकः ॥ ५२ ॥ अन्तरत्यच्छसुस्वान्तो बहिर्व्यवहरत्यसौ । यथा स्त्रीवेषितो नाट्ये द्वैरूप्यमुपसङ्गतः ॥ ५३ ॥ यथा क्रीडन् कुमारेण प्रौढस्तदोषवर्जितः । एवमेष जगत्क्रीडातत्परो निर्मलाश्यः ॥ ५४ ॥ मध्यज्ञानी निरोधस्य प्रकर्षेणाचलस्थितिः । अचलस्थितिरेतस्य विचारस्य प्रकर्षतः ॥ ५५ ॥ बुद्धेस्तु परिपाकेन मध्यमोत्तमयोर्भिदा । अत्र ते शृणु वक्ष्यामि संवादं ज्ञानिनोर्मिथः ॥ ५६ ॥ पुरा हि पर्वतेशोऽभूद्राजा रत्नाङ्गदाह्वयः । जिस प्रकार सारथी रथके द्वारा व्यापार करनेपर भी रथरूप नहीं होता, उसी प्रकार उत्तम ज्ञानी देहसम्बन्धी व्यापारोंमें लगा रहनेपर भी न तो देही होता है और न व्यापार करनेवाला, बस, शुद्ध ज्ञान- स्वरूप ही रहता है ॥ ५१ उ०-५२ ॥ वह भीतरसे अत्यन्त निर्मल और स्वस्वरूपमें स्थित रहते हुए ही ऊपरसे व्यवहार करता है, जिस प्रकार नाटकमें स्त्री-वेश धारण करनेवाला पुरुष दो रूपोंमें स्थित रहता है ॥ ५३ ॥ अथवा जैसे बालकके साथ खेलनेवाला प्रौढ पुरुष उस खेलके हार-जीत आदि दोषोंसे मुक्त रहता है, उसी प्रकार यह उत्तम ज्ञानी लोकलीलामें लगा रहनेपर भी निर्मलचित्त रहता है ॥ ५४ ॥ मध्यम ज्ञानीकी तो निरोधकी अधिकताके कारण अविचल स्थिति रहती है, किन्तु इस उत्तम ज्ञानीकी अचल स्थिति विचारकी उत्कृष्टताके कारण होती है ॥ ५५ ॥ इस प्रकार बुद्धिकी परिपक्वताके तारतम्यसे ही उत्तम और मध्यम ज्ञानियोंका अन्तर रहता है। इस विषयमें मैं तुम्हें दो ज्ञानियों- का पारस्परिक संवाद सुनाता हूँ, श्रवण करो ॥ ५६ ॥ पूर्वकालमें पार्वत्य प्रदेशका रत्नांगद नामक एक राजा हुआ है