भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 352

३३८ त्रिपुरा रहस्ये ज्ञानखण्डे स विपाशामनु पुरीमध्यासीदमृताभिधाम् ॥ ५७ ॥ तस्य पुत्रौ महात्मानौ स्थितावतिमनीषिणौ । रुक्माङ्गदहेमाङ्गदौ जनकस्यातिवल्लभौ ॥ ५८ ॥ तत्र रुक्माङ्गदो ह्यासीच्छास्त्राणां पारदर्शनः । हेमाङ्गदोऽतिविज्ञानी ज्ञानिनामुत्तमोऽभवत् ॥ ५९ ॥ तावुभौ निर्गतौ सर्वसेनाभिः परिवारितौ । मृगयार्थं वसन्तेषु ययतुर्गहनं वनम् ॥ ६० ॥ तत्रानेकान् मृगान् व्याघ्रान् शशकान् महिषानपि । हत्वाऽत्यन्तपरिश्रान्तावासाद्य ह्रदमास्थितौ ॥ ६१ ॥ तद्ध्रदस्य परे पारे न्यग्रोधे ब्रह्मराक्षसः । समस्तशास्त्रपारज्ञो विद्वद्भिर्विवदत्यलम् ॥ ६२ ॥ निर्जितान् भक्षयन्नास्ते चिरकालाद्धि भार्गव । रुक्माङ्गदश्चारमुखाग्निशम्य वादकौतुकी ॥ ६३ ॥ गत्वा तत्र आहूतस्तेन वादपङ्गेऽभवत् । वह विपाशा नदीके तीरपर अमृता नामकी पुरीमें रहता था ॥ ५७ ॥ उसके रुक्मांगद और हेमांगद नामक दो उदारचित्त एवं अत्यन्त बुद्धिमान् पुत्र थे। वे अपने पिताको अत्यन्त प्रिय थे ॥ ५८ ॥ उनमें रुक्माङ्गद तो सम्पूर्ण शास्त्रोंमें अत्यन्त निपुण था और हेमाङ्गद ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और आत्मदर्शी था ॥ ५९ ॥ वे दोनों सम्पूर्ण सेना के साथ नगरसे निकले और वसन्त ऋतुमें मृगयाके लिये सघन वनमें चले गये ॥ ६० ॥ वहाँ उन्होंने अनेकों मृगों, व्याघ्रों, खरहों और भैंसोंका वध किया तथा थककर एक सरोवरके तटपर आकर बैठ गये ॥ ६१ ॥ उस सरोवरके दूसरे तटपर वटवृक्षके ऊपर एक ब्रह्मराक्षस रहता था। वह सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत था और विद्वानोंके साथ बहुत विवाद किया करता था ॥ ६२ ॥ भृगुनन्दन ! वह जिन्हें विवादमें जीत लेता था उन्हें खा जाता था। बहुत दिनोंसे उसका यही क्रम था। रुक्माङ्गदको भी वाद-विवादका बड़ा कुतूहल रहता था। उसने जब जनोंके मुखसे यह समाचार सुना तो