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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

३३८ त्रिपुरा रहस्ये ज्ञानखण्डे स विपाशामनु पुरीमध्यासीदमृताभिधाम् ॥ ५७ ॥ तस्य पुत्रौ महात्मानौ स्थितावतिमनीषिणौ । रुक्माङ्गदहेमाङ्गदौ जनकस्यातिवल्लभौ ॥ ५८ ॥ तत्र रुक्माङ्गदो ह्यासीच्छास्त्राणां पारदर्शनः । हेमाङ्गदोऽतिविज्ञानी ज्ञानिनामुत्तमोऽभवत् ॥ ५९ ॥ तावुभौ निर्गतौ सर्वसेनाभिः परिवारितौ । मृगयार्थं वसन्तेषु ययतुर्गहनं वनम् ॥ ६० ॥ तत्रानेकान् मृगान् व्याघ्रान् शशकान् महिषानपि । हत्वाऽत्यन्तपरिश्रान्तावासाद्य ह्रदमास्थितौ ॥ ६१ ॥ तद्ध्रदस्य परे पारे न्यग्रोधे ब्रह्मराक्षसः । समस्तशास्त्रपारज्ञो विद्वद्भिर्विवदत्यलम् ॥ ६२ ॥ निर्जितान् भक्षयन्नास्ते चिरकालाद्धि भार्गव । रुक्माङ्गदश्चारमुखाग्निशम्य वादकौतुकी ॥ ६३ ॥ गत्वा तत्र आहूतस्तेन वादपङ्गेऽभवत् । वह विपाशा नदीके तीरपर अमृता नामकी पुरीमें रहता था ॥ ५७ ॥ उसके रुक्मांगद और हेमांगद नामक दो उदारचित्त एवं अत्यन्त बुद्धिमान् पुत्र थे। वे अपने पिताको अत्यन्त प्रिय थे ॥ ५८ ॥ उनमें रुक्माङ्गद तो सम्पूर्ण शास्त्रोंमें अत्यन्त निपुण था और हेमाङ्गद ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और आत्मदर्शी था ॥ ५९ ॥ वे दोनों सम्पूर्ण सेना के साथ नगरसे निकले और वसन्त ऋतुमें मृगयाके लिये सघन वनमें चले गये ॥ ६० ॥ वहाँ उन्होंने अनेकों मृगों, व्याघ्रों, खरहों और भैंसोंका वध किया तथा थककर एक सरोवरके तटपर आकर बैठ गये ॥ ६१ ॥ उस सरोवरके दूसरे तटपर वटवृक्षके ऊपर एक ब्रह्मराक्षस रहता था। वह सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत था और विद्वानोंके साथ बहुत विवाद किया करता था ॥ ६२ ॥ भृगुनन्दन ! वह जिन्हें विवादमें जीत लेता था उन्हें खा जाता था। बहुत दिनोंसे उसका यही क्रम था। रुक्माङ्गदको भी वाद-विवादका बड़ा कुतूहल रहता था। उसने जब जनोंके मुखसे यह समाचार सुना तो

एकविंशतितमोऽध्यायः। ३३६ निर्जितस्तेन वादेषु गृहीतो ब्रह्मरक्षसा ॥ ६४ ॥ रुक्माङ्गदोऽथ तं दृष्ट्वा प्राह हेमाङ्गदस्तु तम्। भो ब्रह्मराक्षसैनं त्वं न भक्षयितुमर्हसि ॥ ६५ ॥ मां जित्वाऽवरजं ह्यस्य ततो नौ सह भक्षय। हेमाङ्गदवचः श्रुत्वा प्रोवाच ब्रह्मराक्षसः ॥ ६६ ॥ चिराय लब्धो ह्याहारो बुभुक्षा मां प्रबाधते। एतेन पारणां कृत्वा विवदामि त्वया सह ॥ ६७ ॥ ततस्त्वामपि निर्जित्य भक्षितेन त्वया ततः। अत्यन्तं तर्पितो भूयामिति मे नृप निश्चयः ॥ ६८ ॥ चिरादेष वरः प्राप्तो वसिष्ठात्तु महात्मनः। कदाचिदागतः शिष्यो वसिष्ठस्य तु भक्षितः ॥ ६९ ॥ देवराताभिधस्तेन शप्तस्तेन महात्मना। इतः परं भक्षयित्वा मनुष्यं ब्रह्मराक्षसः ॥ ७० ॥ दग्धं भवेत्तव मुखमिति पश्चान्मया मुनिः।

वह भाईके सहित वहाँ जाकर उससे विवाद करने लगा ॥ ६३--६४ पू०॥ वादमें जीत लिये जानेपर रुक्माङ्गदको ब्रह्मराक्षसने पकड़ लिया। यह देखकर हेमाङ्गदने उससे कहा, "ओ ब्रह्मराक्षस ! तुम इन्हें मत खाओ। मैं इनका छोटा भाई हूँ। मुझे भी जीतकर फिर हम दोनों हीको खा लेना" ॥ ६४ उ०-६६ पू० ॥ हेमाङ्गदकी बात सुनकर ब्रह्मराक्षसने कहा, "मुझे भूख सता रही है। बहुत दिनोंमें यह आहार मिला है। अतः इसके द्वारा पारण करके फिर तुम्हारे साथ विवाद करूँगा ॥ ६६ उ०-६७ ॥ फिर तुमको भी जीतकर जब खा लूँगा तो अत्यन्त तृप्त हो जाऊँगा। राजन् ! ऐसा मेरा विचार है ॥ ६८ ॥ बहुत दिनोंसे महात्मा वसिष्ठसे मुझे ऐसा ही वर मिला हुआ है। एक बार उनका देवरात नामक शिष्य यहाँ आया था, उसे मैं खा गया तो उन्होंने मुझे शाप दिया—॥ ६६-७० पू० ॥ "ब्रह्मराक्षस ! अब आगे यदि तू किसी मनुष्यको खायगा तो तेरा

३४० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भूयः सम्प्रार्थितो मह्यं प्रायच्छद्वरमुत्तमम् ॥ ७१ ॥ वादेषु निर्जितान् मर्त्यान् भक्षय त्वं समन्ततः । इति तद्वादविजितान् भक्षयामि ततस्त्वहम् ॥ ७२ ॥ चिराद्यैष मया प्राप्त आहारः सर्वतोऽधिकः । भक्षयित्वा ततो वादे त्वां विजेष्यामि भूमिप ॥ ७३ ॥ इत्युक्त्वा भक्षणोद्युक्तं पुनरहेमाङ्गदोऽब्रवीत् । ब्रह्मराक्षस मद्वाक्यं किञ्चिच्छृणु मया चितः ॥ ७४ ॥ अपि किञ्चित् प्राप्य चैनं परित्यजसि तद्वद । दत्त्वा तुभ्यं तदेनं तु मोचयामि सहोदरम् ॥ ७५ ॥ इत्युक्तः प्राह भूयस्तं नृपं स ब्रह्मराक्षसः । शृणु राजन्नास्ति तद्वै किञ्चिद्येनेनमुत्सृजे ॥ ७६ ॥ कः प्राणप्रियमाहारं त्यजेत् कालोपसङ्गतम् । किन्त्वेकः समयो मेऽस्ति प्रश्ना मे हृदि संस्थिताः ॥ ७७ ॥ तान्मे यदि प्रतिब्रूयास्तत्ते भ्रातरमुत्सृजे । मुँह जल जायगा।” फिर जब मैंने बहुत प्रार्थना की तो उन्होंने यह उत्तम वर दिया ॥ ७० उ०-७१ ॥ “तुम शास्त्रार्थमें जीते हुए मनुष्योंको सभी जगह खा सकते हो।” इसलिये तबसे मैं वादमें जीते हुए लोगोंको खा जाता हूँ ॥ ७२ ॥ अब बहुत समय बीतनेपर मुझे यह सबसे अच्छा आहार मिला है। अतः राजन् ! इसे खाकर फिर मैं तुम्हें वादमें जीतूँगा” ॥ ७३ ॥ ऐसा कहकर जब वह रुक्मांगदको खानेके लिये उद्यत हुआ तो हेमाङ्गदने कहा, “ब्रह्मराक्षस ! मेरी एक छोटी-सी बात सुन लो । बताओ, क्या मेरे द्वारा दी हुई कोई वस्तु लेकर तुम इन्हें छोड़ सकते हो। मैं तुम्हें वह वस्तु देकर अपने भाईको छुड़ा लूँगा” ॥ ७४-७५ ॥ ऐसा कहे जानेपर उस ब्रह्मराक्षसने राजासे कहा, “राजन् ! सुनो, ऐसी कोई चीज नहीं है जिसके बदलेमें मैं इसे छोड़ दूँ ॥ ७६ ॥ भला, बहुत काल पश्चात् मिले हुए अपने प्राणप्रिय आहारको कौन छोड़ना चाहेगा ? किन्तु मेरा एक प्रण है, मेरे हृदयमें कुछ प्रश्न हैं। यदि तुम उनका उत्तर दे दोगे तो मैं तुम्हारे भाईको छोड़ दूँगा ॥ ७७-७८ पू० ॥

एकविंशतितमोऽध्यायः । ३४१ ततो हेमाङ्गदः प्राह पृच्छ तान् संवदामि ते ॥ ७८ ॥ इत्युक्तो नृपपुत्रं तं पप्रच्छ ब्रह्मराक्षसः । गूढप्रश्नान् क्रमेणैव तद्वक्ष्ये शृणु भार्गव ॥ ७९ ॥ आकाशाद्वितता या स्यात् सूक्ष्मा च परमाणुतः । सा किंरूपा स्थिता कुत्र वदैतन्नृपपुत्रक ॥ ८० ॥ वितता चितिराकाशात् सूक्ष्मा च परमाणुतः । स्फुरद्रूपा स्वात्मसंस्था शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८१ ॥ एकापि साऽतिवितता कथं सूक्ष्मतरा भवेत् । स्फुरत्त्वं किं किमात्मा च वदैतन्नृपनन्दन ॥ ८२ ॥ कारणत्वाद्वि वितता सूक्ष्मा ग्राह्यत्वतोऽपि च । स्फुरत्त्वमात्मा च चितिः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८३ ॥ स्थानं तदुपलब्धौ किं कथं वा सोपलभ्यते । तब हेमाङ्गदने कहा, “पूछो, मैं उनका उत्तर दूँगा।” ऐसा कहे जानेपर ब्रह्मराक्षसने उस राजकुमारसे बड़े गूढ प्रश्न किये। परशुराम ! सुनो, मैं उनका वर्णन करता हूँ—॥ ७८ उ०-७९ ॥ प्र०—राजकुमार ! बतलाओ, जो वस्तु आकाशसे भी अधिक विस्तृत और परमाणुसे भी अधिक सूक्ष्म है, उसका क्या स्वरूप है और वह कहाँ है ? ॥ ८० ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, चिति आकाशसे भी विस्तृत और परमाणुसे भी सूक्ष्म है। वह स्फुरणरूपा है और अपने आत्मामें ही स्थित है ॥ ८१ ॥ प्र०—राजपुत्र ! वह एक ही होनेपर भी अत्यन्त विस्तृत और अत्यन्त सूक्ष्म कैसे हो सकती है ? स्फुरण क्या है और आत्मा क्या है—यह बताओ ॥ ८२ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, सबका कारण होनेके कारण तो वह विस्तृत है और इन्द्रिय आदि से ग्राह्य न होनेके कारण सूक्ष्म है। तथा स्फुरण और आत्मा चितिको ही कहते हैं ॥ ८३ ॥ प्र०—राजकुमार ! बताओ, उसकी उपलब्धि का स्थान क्या है .

३४२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे उपलब्ध्या च किं वा स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ ८४ ॥ धीः स्थानमुपलब्धौ तु स्वैकाग्र्यात् सोपलभ्यते । उपलब्ध्या जनिर्न स्याच्छृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८५ ॥ धीः केयं समाख्याता तदैकाग्र्यं च कीदृशम् । जनिर्वापि भवेत् का सा वदैतन्नृपनन्दन ॥ ८६ ॥ चितिर्जाड्यावृता धीः स्यादैकाग्र्यं स्वात्मविश्रमः । जनिर्देहात्मताबुद्धिः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८७ ॥ कस्माच्चितेर्नोपलब्धिः केन वा सोपलभ्यते । जनिः कथं वा सम्प्राप्ता वदैतन्नृपनन्दन ॥ ८८ ॥ अविवेकान्नोपलब्धिरात्मना सोपलभ्यते । जनिः कर्तृत्वाभिमानाच्छृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८९ ॥ कोऽविवेकस्त्वया प्रोक्तस्तथात्मा वापि को भवेत् । किस प्रकार उसकी उपलब्धि होती है ? और उसे उपलब्ध कर लेनेसे क्या होता है ? ॥ ८४ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, उसकी उपलब्धिका स्थान बुद्धि है, चित्तकी एकाग्रतासे उसकी उपलब्धि होती है और उसे उपलब्ध कर लेनेपर फिर जन्म नहीं होता ॥ ८५ ॥ प्र०—राजकुमार ! बताओ, बुद्धि किसे कहते हैं ? उसकी एकाग्रता कैसी होती है ? और जन्म लेना क्या है ? ॥ ८६ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जड़ता (अविद्या) से आवृत चिति ही बुद्धि है, अपने आत्मामें ठहर जाना एकाग्रता है और देहमें आत्मबुद्धि ही जन्म है ॥ ८७ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि चिति उपलब्ध क्यों नहीं होती ? वह किस साधनसे उपलब्ध होती है ? और जन्मकी प्राप्ति कैसे हुई है ? ॥ ८८ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, अविवेकके कारण उपलब्धि नहीं होती, वह स्वयं ही उपलब्ध होती है और जन्मकी प्राप्ति हुई है कर्तापनके अभिमानसे ॥ ८९ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि तुमने अविवेक किसे कहा ?

एकविंशतितमोऽध्यायः । ३४३ को वा कर्तृत्वाभिमानो वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९० ॥ अविवेकोऽपृथग्ज्ञानमात्मानं पृच्छ स्वात्मनि । तद्वासनाभिमानः स्याच्छृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९१ ॥ अविवेकः केन नश्येत्तस्य किं वा हि कारणम् । तस्यापि किं कारणं स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९२ ॥ विचारेण स नश्येद्वै वैराग्यं तस्य कारणम् । तत्कारणं दोषदृष्टिः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९३ ॥ को विचारो भवेत् किं वा वैराग्यं सम्प्रचक्षते । दोषदृष्टिश्च का प्रोक्ता वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९४ ॥ दृग्दृश्ययोः परीक्षातो दृश्ये तत्परिवर्जनम् । दुःखबुद्धिः सा हि दृश्ये शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९५ ॥ एतत् सर्वं केन भवेत् स वा कस्मादवाप्यते । और स्वयं (आत्मा) क्या है? तथा कर्तापनका अभिमान किसे कहते हैं ॥ ६० ॥ उ०-ब्रह्मराक्षस ! सुन, देहादिसे आत्माको भिन्न न समझना अविवेक है, आत्मा क्या है—यह अपनेहीसे पूछ ले तथा 'मैं करता हूँ' ऐसी वासना ही कर्तापनका अभिमान है ॥ ६१ ॥ प्र०-राजकुमार ! बताओ, अविवेकका नाश कैसे हो सकता है ? उसका कारण क्या है और उस कारणका भी क्या कारण है ? ॥ ६२ ॥ उ०-ब्रह्मराक्षस ! सुन, अविवेकका नाश विचारसे होता है ! उसका कारण वैराग्य है और वैराग्यका कारण है विषयोंमें दोषदृष्टि ॥ ६३ ॥ प्र०-राजकुमार ! यह बताओ कि विचार क्या है ? वैराग्य किसे कहते हैं और दोषदृष्टि क्या कहलाती हैं ? ॥ ६४ ॥ उ०-ब्रह्मराक्षस ! सुन, द्रष्टा और दृश्यकी पहचान करना विचार है, दृश्यमें राग न रखना वैराग्य है और दृश्यमें दुःखबुद्धि हो जाना दोषदृष्टि है ॥ ६५ ॥ प्र०-राजकुमार ! यह बतलाओ कि ये सब होंगे कैसे ? और के

३४४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्र वा किं निदानं स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९६ ॥ देवतानुग्रहात् सर्वं भक्त्या सा हि समाप्यते । निदानं सत्सङ्ग एव शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९७ ॥ का देवता च सम्प्रोक्ता का च सा भक्तिरुच्यते । सन्तश्च कीदृशाः प्रोक्ता वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९८ ॥ देवता स्याज्जगद्धात्री भक्तिस्तत्परतोच्यते । सन्तः शान्ता दयावन्तः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९९ ॥ सदा बिभेति को लोके सदा दुःखपरोऽपि कः । सदा दैन्ययुतः को वा वदैतन्नृपनन्दन ॥ १०० ॥ रू धनी सदा भीतो दुःखी बहुकुटुम्बवान् । आशाग्रस्तः सदा दीनः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०१ ॥ निर्भयः को भवेल्लोके निर्दुःखश्चापि को भवेत् । अदीनः सर्वदा कः स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ १०२ ॥ साधन भी किस प्रकार प्राप्त होंगे तथा उसका भी मूल कारण क्या है ॥ ९६ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, ये सब भगवत्कृपासे हो सकते हैं, भग- वत्कृपा भक्तिसे प्राप्त होती है और उसका भी मूल सत्संग है ॥ ९७ ॥ प्र०—राजकुमार ! बताओ, भगवान् किसे कहते हैं ? भक्ति क्या कही जाती है और संत किन लोगोंको कहा जाता है ? ॥ ९८ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जो जगत्को धारण करनेवाला है वह भगवान् है । उन्हींमें मन लगा देना भक्ति है तथा शान्त और दयावान् पुरुष सन्त होते हैं ॥ ९९ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि संसारमें सर्वदा कौन डरता रहता है ? कौन दुःखमें डूबा रहता है ? और कौन दीनतामें फँसा हुआ है ? ॥ १०० ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जो बहुत अधिक धनी होता है वह सदा डरता रहता है, अधिक कुटुम्बवाला दुःखी रहता है और आशाओंमें फँसा हुआ सदा दीन रहता है ॥ १०१ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ, लोकमें निर्भय कौन हो सकता है, दुःखहीन कौन है और सर्वदा दैन्यशून्य कौन रहता है ? ॥ १०२ ॥

एकविंशतितमोऽध्यायः । ३४५ निर्भयः सङ्गरहितो निर्दुःखो जितमानसः । ज्ञातज्ञेयस्त्वदीनात्मा शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०३ ॥ दुर्लक्ष्यः स्यात् को हि लोके विदेहो दृश्यते च कः । निष्क्रियस्य क्रिया का स्याद्वैतन्नृपनन्दन ॥ १०४ ॥ जीवन्मुक्तो हि दुर्लक्ष्यो विदेहो देहवानपि । तत्क्रिया निष्क्रियस्योक्ता शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०५ ॥ किमस्ति किं नास्ति लोके कोऽत्यन्तासम्भवो भवेत् । एतावदुक्त्वा नृपते मोचय द्रुतमग्रजम् ॥ १०६ ॥ दृगस्ति नास्ति वै दृश्यं व्यवहारो ह्यसम्भवी । उक्तमेतद्ब्रह्मरक्षो मुञ्च मद्‌भ्रातरं द्रुतम् ॥ १०७ ॥ श्रुत्वैतदथ सन्तुष्टो मुमोच ब्रह्मराक्षसः । रुक्माङ्गदं ततः पश्चादभवद्ब्राह्मणो हि सः ॥ १०८ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जिसकी किसीमें आसक्ति नहीं है, वह निर्भय रहता है, जिसका मनपर अधिकार है वह दुःखहीन रहता है और जिसने जाननेयोग्य वस्तुको जान लिया है उसमें दीनता नहीं रहती ॥ १०३ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि लोकमें जिसकी पहचान अत्यन्त कठिन है वह कौन है ? विदेह होकर भी दिखायी कौन देता है और निष्क्रियकी क्रिया क्या है ? ॥ १०४ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जीवन्मुक्तकी पहचान अत्यन्त कठिन है, वही देहवान् होकर भी विदेह है और उसकी क्रिया ही निष्क्रियकी क्रिया कही जाती है ॥ १०५ ॥ प्र०—लोकमें कौन-सी वस्तु है और कौन-सी नहीं है ? तथा अत्यन्त असम्भव क्या है ? राजन् ! बस, इतना बतला देनेपर मैं तुरन्त तुम्हारे भाईको छोड़ दूँगा ॥ १०६ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! द्रष्टा चेतन है और दृश्य नहीं है तथा व्यवहार असम्भव है। इस प्रकार मैंने तुम्हारे इस प्रश्नका भी उत्तर दे दिया अब तुरन्त मेरे भाईको छोड़ दो ॥ १०७ ॥ यह सब सुनकर ब्रह्मराक्षस बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने रुक्मा- ङ्गदको छोड़ दिया। उसके पश्चात् वह भी ब्राह्मण ही हो गया ॥ १०८ ॥

३४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तेजस्विनं तपोमूर्त्तिं दृष्ट्वा ब्राह्मणरूपिणम् । पप्रच्छतू राजसुतौ को भवानिति शङ्कितौ ॥ १०९ ॥ अथ प्राह ब्राह्मण्यः स्ववृत्तं वै यथातथम् । अहं पुरा ब्राह्मणस्तु मगधेष्वभिविश्रुतः ॥ ११० ॥ वसुमानिति विख्यातः सर्वशास्त्रविशारदः । सभासु निर्जिता भूयो मया विद्याभिमानिना ॥ १११ ॥ विद्वांसः शतशो विप्रास्ततोत्यन्तसुगर्वितः । कदाचिन्मगधेशस्य सभायामष्टकं मुनिम् ॥ ११२ ॥ परावरज्ञं संशान्तं वादार्थी सङ्गतोऽभवम् । शुष्कतर्कैकनिपुण आत्मविद्याविचारणे ॥ ११३ ॥ ततो मया स आक्षिप्तः केवलं तर्कयुक्तिभिः । समाधानवचस्तस्य बह्वागमसुबृंहितम् ॥ ११४ ॥ दूषयित्वा तर्कजालैरधिक्षेपपरोऽभवम् । उसे एक तेजस्वी तपोमूर्त्ति ब्राह्मणके रूपमें देखकर उन राज- कुमारोंने शंकित होकर पूछा, "आप कौन हैं ?" ॥ १०६ ॥ तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने ज्योंका त्यों अपना वृत्तान्त सुनाया, "मैं पूर्वकालमें मगधदेशमें एक सुप्रसिद्ध ब्राह्मण था ॥ ११० ॥ मैं वसुमान् नामसे विख्यात और सभी शास्त्रोंमें कुशल था। विद्याका मुझे बड़ा अभिमान था और मैंने सभाओंमें सैकड़ों विद्वान् ब्राह्मणोंको अनेकों बार परास्त कर दिया था। इससे मैं अत्यन्त गर्वित हो गया था ॥ १११-११२ पू० ॥ मैं शास्त्रार्थके लिये तो उत्सुक रहता ही था और शुष्क तर्क करनेमें बहुत निपुण भी था। एक बार आत्मविद्याके विषयमें विचार करनेके प्रसंगसे मगधनरेशकी सभामें अष्टक मुनिसे मेरा समागम हो गया। वे परमात्मतत्त्वको जाननेवाले और अत्यन्त शान्त थे ॥११२ उ०-११३॥ उस समय मैं केवल शुष्कतर्ककी युक्तियोंसे उनका खण्डन करता रहा। उसके उत्तरमें उनका जो अनेकों शास्त्रोंसे प्रमाणित समाधान वचन होता था उसे अपने तर्कजालसे काटकर मैं बार-बार आक्षेप (खण्डन) ही करता रहा ॥ ११४-११५ पू० ॥

एकविंशतितमोऽध्यायः। ३४७ अधिक्षिप्तोऽपि बहुधा मया राजसभागतः ॥ ११५ ॥ शान्तस्तूष्णीं बभूवाथ शिष्यस्तस्य महात्मनः। काश्यपो मां क्रोधवशाच्छशाप नृपसंसदि ॥ ११६ ॥ आचार्यं मेऽधिक्षिपसि त्वमस्थाने द्विजाधम। यतस्तस्माच्चिरं कालं ब्रह्मरक्षो भविष्यसि ॥ ११७ ॥ शप्त एवमहं तेन भीतोऽत्यन्तं तदा मुनिम्। वेपमानः प्रणम्याशु चाष्टकं शरणं गतः ॥ ११८ ॥ मयि सोऽथ दयाञ्चक्रे विरोधिन्यपि शान्तधीः। शापस्यान्तं ददौ मह्यं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ११९ ॥ प्रश्नांस्त्वयापि हि कृतान् प्रत्युक्तांश्च मया हि तान्। स्थापितान् केवलैस्तर्कैर्यदेकः प्रतिवक्ष्यति ॥ १२० ॥ कश्चिद्विद्वांस्तदा शापाद्विमुक्तस्त्वं भविष्यसि। तच्छापादथ ते मुक्तश्चिराय नृपनन्दन ॥ १२१ ॥ राजसभा में मेरे द्वारा बार-बार आक्षेप किये जानेपर भी वे शान्त और मौन ही रहे। तब उन महात्माके काश्यप नामक शिष्यने क्रोधातुर हो उस राजसभामें मुझे शाप दिया ॥ ११५ उ०-११६ ॥ “अरे ब्राह्मणाधम ! तू अकारण ही मेरे गुरुदेवका अनादर कर रहा है, इसलिये तू दीर्घकालतक ब्रह्मराक्षस रहेगा” ॥ ११७ ॥ उसका ऐसा शाप होनेपर मैं बड़ा भयभीत हुआ और काँपते हुए उन अष्टक मुनिको प्रणाम कर उन्हींकी शरणमें गया ॥ ११८ ॥ मुनि शान्तचित्त थे, अतः विरोधी होनेपर भी मुनिने मुझपर दया की। उन्होंने उस शापका जो अन्त निश्चित किया वह मैं बतलाता हूँ, सुनो ॥ ११९ ॥ तुमने मुझसे जो प्रश्न किये और मेरे समाधान करनेपर भी तुमने केवल तर्कके बलसे उन्हें खड़े रखा, उनका जब कोई एक ही विद्वान् समाधान कर देगा, उस समय तुम इस शापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १२०-१२१ पू० ॥ राजकुमार ! अब बहुत समय बीतनेपर तुमने मुझे उस शापसे

३४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तच्चां मन्ये महात्मानं ज्ञातज्ञेयं नृपूत्तमम् । इत्युक्तस्तेन विप्रेण विस्मितोऽभून्नृपात्मजः ॥ १२२ ॥ ततो भूयो नृपसुतोऽनुयुक्तस्तेन सर्वशः । वसुमन्तं बोधयित्वा सम्यक् प्रागात् पुरं स्वकम् ॥ १२३ ॥ प्रणम्य वसुमन्तं तं सहितो भ्रातृसैनिकैः । एतत्ते सर्वमाख्यातं यत् पृष्टं भार्गव त्वया ॥ १२४ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे रक्षसोपाख्यानं एकविंशतितमोऽध्यायः । छुड़ाया है। अतः मैं तुम्हें महात्मा, ज्ञातज्ञेय और राजाओंमें श्रेष्ठ समझता हूँ॥ १२१ उ०-१२२ पू० ॥ उस ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजकुमारको बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पुनः प्रश्न किये और राजकुमारने सब प्रकार वसुमान्‌का समाधान किया। फिर वह वसुमान्‌को प्रणाम कर अपने भाई तथा सैनिकोंके सहित अपने नगरको चला गया। परशुराम ! तुमने जो कुछ पूछा था वह सब मैंने तुमसे कह दिया ॥ १२२ उ०-१२४ ॥ एकविंशतितम अध्याय समाप्त।

द्वांविशोऽध्यायः श्रुत्वैवं राक्षसकथां रामो भृगुकुलोद्भवः । पुनः पप्रच्छावधूतकुलेशं प्रश्रयाश्रयः ॥ १ ॥ भगवन् किं तेन पृष्टं शापमुक्तद्विजेन वै । हेमाङ्गदेन किं प्रोक्तमेतन्मे कृपया वद ॥ २ ॥ कौतुक्यत्यन्तमत्राहं न तदल्पं भवेत् क्वचित् । इति पृष्टः पुनः प्राह दत्तात्रेयो दयापरः ॥ ३ ॥ राम तत्ते प्रवक्ष्यामि महार्थं तत् प्रभाषितम् । ततः पप्रच्छ वसुमान् हेमाङ्गदमुपस्थितम् ॥ ४ ॥ राजपुत्र किञ्चिदहं पृच्छामि त्वं समीरय । अहमष्टकयोगीशात्तद्ज्ञासिषमादितः ॥ ५ ॥ द्वांविशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ वसुमानका समाधान, ग्रन्थका सारांश इस प्रकार राक्षसकी कथा सुनकर भृगुकुलमें अवतीर्ण श्रीपरशु- रामजीने विनयावनत हो अवधूतशिरोमणि श्रीदत्तात्रेयजीसे पुनः पूछा ॥ १ ॥ "भगवन् ! शापसे मुक्त हुए उस ब्राह्मणने क्या पूछा था और हेमाङ्गदने उसका क्या उत्तर दिया, कृपापूर्वक यह मुझसे कहिये ॥ २ ॥ इस विषयमें मुझे बड़ा कौतूहल है, वह कोई छोटी बात कभी नहीं हो सकती। ऐसा प्रश्न होनेपर श्रीदत्तात्रेयजीने दयालु होकर पुनः कहना आरम्भ किया—॥ ३ ॥ "परशुराम ! वह सम्भाषण बड़े गम्भीर अर्थसे भरा हुआ है, मैं तुम्हें सुनाता हूँ। तब वसुमान्ने समीप ही बैठे हुए हेमाङ्गदसे पूछा—॥ ४ ॥ "राजपुत्र ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, आप वर्णन करें। आरम्भमें मैंने योगिराज अष्टकसे यह तत्त्व जाना था ॥ ५ ॥

३५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भूयस्त्वदुक्त्या च सम्यग् विदितं परमं पदम् । किन्तु ते ज्ञाततत्त्वस्य कथं स्थितिरियं भवेत् ॥ ६ ॥ कथं ज्ञातसुविज्ञेयो व्यवहारपरायणः । ध्वान्तप्रकाशयोर्यद्वत् स्थितिरेकत्र सम्भवेत् ॥ ७ ॥ एतन्मे राजतनय ब्रूहि सम्यग् यथास्थितम् । इत्यापृष्टः प्राह हेमाङ्गदस्तं ब्राह्मणोत्तमम् ॥ ८ ॥ ब्रह्मन् ते भ्रान्तिरद्यापि न सम्यक् प्रविनाशिता । व्यवहारेण किं ज्ञानं बाध्यते स्वात्मसम्भवम् ॥ ९ ॥ व्यवहारवशाज्ज्ञानं बाध्यते च ततः कथम् । पुरुषार्थस्य लाभः स्यात् स्वप्नज्ञानसमेन वै ॥ १० ॥ सर्वोऽपि व्यवहारोऽयं ज्ञानमाश्रित्य सम्भवेत् । तज्ज्ञानं बाध्यते तेन कथं तन्मे समीरय ॥ ११ ॥ अब आपके कथनसे मुझे पुनः उस परम पदका अच्छी तरह ज्ञान हो गया। किन्तु तत्त्वज्ञ होनेपर भी आपकी ऐसी स्थिति क्यों होनी चाहिये ? ॥ ६ ॥ जिसने ज्ञेय तत्त्वको जान लिया है वह व्यवहारमें कैसे लगा रह सकता है ? यह तो ऐसी ही बात होगी जैसे अन्धकार और प्रकाशकी स्थिति एक जगह हो जाय ॥ ७ ॥ राजकुमार ! इसमें जो भी कारण हो वह मुझे ज्योंका त्यों समझाकर कहिये।" ऐसा पूछा जानेपर हेमाङ्गदने उस विप्रश्रेष्ठसे कहा—॥ ८ ॥ "ब्रह्मन् ! आपका भ्रम अभी अच्छी तरह निवृत्त नहीं हुआ है। क्या अपने ही आत्मस्वरूपसे रहनेवाला ज्ञान व्यवहारसे बाधित हो जाता है ? ॥ ९ ॥ यदि व्यवहारके कारण; ज्ञान बाधित हो जाय तब तो स्वप्नमें होनेवाले ज्ञानके समान हुआ। उससे मोक्षरूप पुरुषार्थकी प्राप्ति कैसे हो सकेगी ? ॥ १० ॥ यह सारा व्यवहार तो ज्ञानके आश्रयसे ही होता है। फिर उसीसे वह बाधित कैसे हो जायगा—यह मुझे बताओ ॥ ११ ॥

द्वाविंशोऽध्यायः । ३५१ ज्ञानं तदेव हि भवेद् यत्रेदं भासते जगत् । सङ्कल्पाद् व्यवहारो हि ज्ञाने सर्वं प्रकाशते ॥ १२ ॥ असङ्कल्पेन तद्रूपमनुलक्ष्य धिया सकृत् । कृतार्थो बन्धनिर्मुक्तो भवतीति सुनिश्चयः ॥ १३ ॥ तस्माद् ब्रह्मन् ते प्रश्नः सम्मतोऽयं सुबुद्धिभिः । पुनस्तं प्राह वसुमान् नृपसूनुं महाशयम् ॥ १४ ॥ सत्यं राजकुमारैतन्मयापीत्थं सुनिश्चितम् । स्वरूपं निर्विकल्पं हि संवेदनमिहोच्यते ॥ १५ ॥ सविकल्पत्वमापन्ने पुनर्भ्रान्तिः कुतो न हि । विकल्प एव हि भ्रान्तिर्यथा रज्जौ भुजङ्गमः ॥ १६ ॥ शृणु ब्रह्मन् न जानासि भ्रमाभ्रमविनिर्णयम् । गगने नीलिमा भाति गगनं जानतामपि ॥ १७ ॥ व्यवहारं च कुर्वन्ति नीलं नभ इति क्वचित् । जिसमें यह जगत् भास रहा है वही तो ज्ञान है । केवल संकल्पके द्वारा ज्ञानमें ही तो सारे व्यवहारका भास होता है ॥ १२ ॥ हाँ, यह बात बिलकुल निश्चित है कि निःसंकल्प हो जानेसे बुद्धिके द्वारा एक बार उस आत्मस्वरूपको लख लेनेपर जीव बन्धनसे मुक्त होकर कृतार्थ हो जाता है ॥ १३ ॥ इसलिये ब्रह्मन् ! आपका यह प्रश्न श्रेष्ठ बुद्धिवालोंको मान्य नहीं है ।” तब वसुमान्ने उस उदारचित्त राजकुमारसे पुनः कहा—॥ १४ ॥ “राजकुमार ! यह बात ठीक है और मैंने भी ऐसा ही निश्चय किया है । वास्तवमें अपना निर्विकल्प स्वरूप ही शुद्धचिति कहा गया है ॥ १५ ॥ किन्तु यदि वह विकल्पयुक्त हो जाय तो पुनः भ्रान्ति क्यों नहीं होगी ? क्योंकि जैसे रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है वैसे विकल्प ही तो भ्रान्ति है” ॥ १६ ॥ [ राजपुत्र— ] “ब्रह्मन् ! सुनो, आप तो भ्रम और भ्रमहीनताका निर्णय करना भी नहीं जानते । जो लोग आकाशको जानते हैं उन्हें भी उसमें नीलिमा तो दिखायी देती ही है । और वे ‘आकाश नीला

३५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तावतैव तु तज्ज्ञानं न भ्रान्तिरभिधीयते ॥ १८ ॥ अतत्त्वज्ञे हि सा भ्रान्तिस्तत्त्वज्ञे सा प्रमैव हि । हतप्रामाण्यजीवं तज्ज्ञानं मृतमहाहिवत् ॥ १९ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बस्य व्यवहारसमो भवेत् । अभिज्ञस्यानभिज्ञस्य चाप्यतोऽस्ति भिदा तयोः ॥ २० ॥ ज्ञस्य प्रमैव तज्ज्ञानमज्ञस्य तु भ्रमात्मकम् । ज्ञानिनां ज्ञानमेव स्यात् सर्वोऽपि व्यवहारकः ॥ २१ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बानां व्यवहारेण सम्मितः । अभिज्ञानामतो भूयो न हि भ्रान्तेः समुद्भवः ॥ २२ ॥ केवलाज्ञानजनितं ज्ञानेन विनिवर्त्तते । दोषेण जनितं कस्माद्विलीयेज्ज्ञानमात्रतः ॥ २३ ॥ है,' ऐसा बोलकर कभी व्यवहार भी करते ही हैं। किन्तु इतनेसे ही उनका वह ज्ञान भ्रान्ति तो नहीं कहा जाता ॥ १७-१८ ॥ अज्ञानीमें तो आकाशकी नीलिमाका ज्ञान भ्रान्ति ही है, किन्तु तत्त्वज्ञमें तो वह प्रमा ही है। उनका वह ज्ञान प्रामाण्यरूप जीवनसे रहित होनेके कारण मरे हुए सर्पके समान किसी अनर्थका कारण नहीं होता ॥ १९ ॥ ज्ञानियोंका व्यवहार दर्पणके प्रतिबिम्बकी हलचलके समान होता है। अतः ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनोंके व्यवहारमें भेद तो है ही ॥ २० ॥ वह व्यवहारसम्बन्धी ज्ञान ज्ञानीकी तो प्रमा है और अज्ञानीका भ्रम है। ज्ञानियोंके लिये तो सारा व्यवहार भी ज्ञानस्वरूप ही है ॥ २१ ॥ उनके लिये वह दर्पणमें भासनेवाले प्रतिबिम्बोंके व्यवहारके समान होता है । इसलिये ज्ञानियोंको पुनः भ्रान्ति की उत्पत्ति नहीं हो सकती ॥ २२ ॥ ज्ञानसे तो उसीकी निवृत्ति होती है जो केवल अज्ञानसे उत्पन्न हुआ हो। किन्तु जिसकी उत्पत्ति किसी अन्य दोषके कारण हुई हो वह केवल ज्ञानसे कैसे लीन हो सकता है ? ॥ २३ ॥

द्वाविंशोऽध्यायः । ३५३ अत एव तैमिरिकः पश्येज्जानन्नपि द्वयम् । जगदाभास एषस्तु कर्मदोषसमुद्भवः ॥ २४ ॥ तस्मादाकर्मविलयं व्यवहारो न लीयते । समाप्ते कर्मणि ततः शिष्येदद्वयचिन्मयम् ॥ २५ ॥ तस्मान्नास्त्येव विज्ञानं कदापि भ्रान्तिसम्भवः । इति श्रुत्वा पुनर्विप्रः पप्रच्छ नृपनन्दनम् ॥ २६ ॥ अहो नृपात्मज कथं ज्ञानिनां कर्म सम्भवेत् । ज्ञानाग्निसंस्पर्शनेऽपि कर्मतूलः कथं स्थितः ॥ २७ ॥ अथाह हेमाङ्गदोऽपि विप्रं तं नृपनन्दन । ब्रह्मन् शृणु प्रवक्ष्यामि त्रिविधं कर्म ज्ञानिनाम् ॥ २८ ॥ सर्वेषाञ्च समानं स्यादपक्वं पक्वमेव च । हतोदितं चेति तत्र नश्येज्ज्ञानादमध्यमम् ॥ २९ ॥ कर्मणा पाचकः कालो नियत्या नियतः स्थितः । यही कारण है कि तिमिर रोगवाला व्यक्ति यह जानते हुए भी कि पदार्थ एक है उसे दो रूपमें देखता है। यह जगत्‌की प्रतीति तो प्रारब्ध कर्मरूप दोषसे उत्पन्न हुई है। इसलिये जबतक प्रारब्धक्षय नहीं होता तबतक व्यवहारका भी लय नहीं होता। प्रारब्धकर्म समाप्त होनेपर तो केवल अद्वय चिन्मात्र तत्त्व ही रह जाता है ॥ २४-२५ ॥ इसलिये विज्ञानमें भ्रान्तिकी उत्पत्ति कभी नहीं हो सकती।” ऐसा सुनकर उस ब्राह्मणने राजकुमारसे पुनः पूछा—॥ २६ ॥ “हे राजकुमार ! ज्ञानीके द्वारा भला कर्म कैसे हो सकता है? ज्ञानाग्निका स्पर्श हो जानेपर भी कर्मरूपी कपास कैसे रह सकती है?” ॥ २७ ॥ तब राजकुमार हेमाङ्गदने भी उस ब्राह्मणसे कहा, “ब्रह्मन् ! सुनो, मैं बतलाता हूं । सभी ज्ञानियोंके कर्म समानरूपसे तीन प्रकारके होते हैं—अपक्व, पक्व और हतोदित। इनमेंसे मध्यम (पक्व) को छोड़कर शेष दो नष्ट हो जाते हैं' ॥ २८-२९ ॥ नियति (विधाता) ने कालको कर्मोंका परिपाक करनेवाला नियुक्त

३५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कालेन पाचितप्रायं पक्वं कर्म समीरितम् ॥ ३० ॥ अपाचितमपक्वं स्याज्ज्ञानोत्पत्तेरनन्तरम् । कृतं हतोदितं विद्धि ज्ञानाद्धतसमुद्भवात् ॥ ३१ ॥ तत्र पक्वं तु यत् कर्म तदारब्धमितीर्यते । आवेगं मुक्तशरवत्तिष्ठत्येव फलप्रदम् ॥ ३२ ॥ तन्मूलको जगद्भासो ज्ञानस्य तारतम्यतः । स्थितोऽपि भ्रान्तितुल्योपि न भ्रान्तिः फलभेदतः ॥ ३३ ॥ जनयेत्तत्कालफलं मन्दज्ञानवतां स्फुटम् । मध्यानामस्फुटं तच्च ज्ञानिनां फलभासनम् ॥ ३४ ॥ उत्तमानान्तु तत्कालफलञ्च स्पष्टभासनम् । शशशृङ्गसमं ब्रह्मन् न हि तत्फलमुच्यते ॥ ३५ ॥ अज्ञानिनां कर्मफलं पुष्टं पूर्णानुसन्धितः । किया है। जो कर्म कालके द्वारा प्रायः परिपक्व (फलोन्मुख) कर दिये जाते हैं वे 'पक्व' कर्म कहे गये हैं ॥ ३० ॥ जो परिपक्व नहीं हुए हैं वे 'अपक्व' हैं और जो ज्ञानोत्पत्तिके पीछे किये जाते हैं उन्हें 'हतोदित' समझो, क्योंकि वे ज्ञानसे हत हुए ही उत्पन्न होते हैं ॥ ३१ ॥ इनमें जो पक्व कर्म हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं। वे छोड़े हुए बाणके समान अपना वेग रहनेतक फल प्रदान करते ही हैं ॥ ३२ ॥ ज्ञानकी न्यूनाधिकताके अनुसार उन्हींके कारण जगत्की प्रतीति बनी रहती है। वह जगत्प्रतीति भ्रान्तिके समान होनेपर भी फलमें भेद रहनेके कारण भ्रान्ति नहीं है ॥ ३३ ॥ मन्द ज्ञानियोंको यह प्रारब्ध तत्काल स्पष्ट फल प्रदान करता है। और मध्यम ज्ञानियोंको वह फलका भास अस्पष्ट होता है ॥ ३४ ॥ उत्तम ज्ञानियोंको फलका भास तत्काल एवं स्पष्ट तो होता है, किन्तु ब्रह्मन् ! उनकी दृष्टिमें वह शशशृंगके समान असत् होनेके कारण फल कहा नहीं जाता ॥ ३५ ॥ अज्ञानियोंको तो कर्मफलका अनुसन्धान पहले हीसे बना रहता है,

द्वाविंशोऽध्यायः । ३५५ पूर्वापरानुसन्धानात् पोषितं तत्फलन्तु तैः ॥ ३६ ॥ ज्ञानिनां फलसन्धानं छिन्नमात्मानुसन्धितः । अतो न पुष्टं मन्दानामारब्धजनितं फलम् ॥ ३७ ॥ मध्यानां ज्ञानिनां तच्च फलं मन्दसुषुप्तिषु । मशकादिकृतं दुःखमिव तत् सूक्ष्मतां गतम् ॥ ३८ ॥ उत्तमज्ञानिनां तत्तु फलं पूर्णमपि स्थितम् । दग्धरज्जुरिव भवेत् स्थितात्मज्ञानवैभवात् ॥ ३९ ॥ यथा नाटकवृत्तेषु नरो वेषान्तरं गतः । हृष्यन् विषीदंश्च भूयो नान्तर्विकृतिमाप्नुयात् ॥ ४० ॥ एवमेष स्थितज्ञानी सुपूर्णफलसङ्गतः । न फलैः स्पृश्यते तस्मात्तत्फलं शशशृङ्गवत् ॥ ४१ ॥ अज्ञानिभिस्तु शुद्धात्मा नोपलक्षित एव हि । इसलिये वह पुष्ट होता है। पूर्वापरका अनुसन्धान रहनेके कारण वे उस फलका पोषण करते रहते हैं ॥ ३६ ॥ ज्ञानियोंको आत्माका अनुसन्धान होता रहनेसे बीच-बीचमें उनका फलानुसन्धान टूटता रहता है। इसीसे मन्द ज्ञानियोंका प्रारब्धजनित फल पुष्ट नहीं होता ॥ ३७ ॥ मध्यम ज्ञानियोंके लिये तो वह फल, हल्की सुषुप्तिमें मच्छर आदिके काटनेसे होनेवाले दुःखके समान बहुत कम दुःख देता है ॥ ३८ ॥ उत्तम ज्ञानियोंको वह कर्मफल पूर्णतया प्राप्त होनेपर भी स्थिर आत्मज्ञानके प्रभावसे जली हुई रस्सीके समान केवल प्रतीतिमात्र रहता है ॥ ३६ ॥ जिसप्रकार नाटकमें अभिनय करते समय पुरुष अन्य वेष धारण करके हर्ष और शोककी भूमिका करनेपर भी भीतरसे किसी प्रकारके विकारको प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार यह निष्ठावान् ज्ञानी पूर्णतया फलका संग प्राप्त होनेपर भी उससे स्पृष्ट नहीं होता। इसलिये उसका वह फलभोग शशशृंगके समान केवल कथनमात्र ही होता है ॥ ४०-४१ ॥ अज्ञानियोंको तो शुद्ध आत्माका पता ही नहीं होता, इसलिये वे तो

३५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतो देहात्मभूतास्ते दृश्यसत्त्वविमर्शनाः ॥ ४२ ॥ मन्दज्ञानिभिरात्मा तु विदितः शुद्धचिन्मयः । जगच्चासत्यतो दृष्टं तथाप्यभ्यासमान्द्यतः ॥ ४३ ॥ प्राग्वासनाहृतज्ञानास्ते देहात्मप्रभासनम् । जगतः सत्यताभासं मध्ये मध्ये समाययुः ॥ ४४ ॥ भूयो ज्ञानवासना या विधुन्वन्त्यसतीं दृशम् । वासनैवं सत्यमिथ्याज्ञानयोश्च परस्परम् ॥ ४५ ॥ मिलिता मन्दज्ञानिनामतो मध्ये फलं स्फुटम् । समेऽपि वासने चैते न हि तुल्ये महीसुर ॥ ४६ ॥ सत्यज्ञानवासनया बाध्यते वासना परा । न च मिथ्या वासनया बाध्यते सत्यवासना ॥ ४७ ॥ मिथ्यावासनयाविष्टो विस्मृतः केवलां परः । ततो मिथ्यावासनां तु विनिश्चित्य भ्रमात्मिकाम् ॥ ४८ ॥ देहको ही आत्मा समझते हैं और दृश्यको भी सत्य ही मानते हैं ॥४२॥ मन्द ज्ञानियोंको शुद्ध चिन्मय आत्माका ज्ञान होता है और उन्हें जगत् भी असत्य दिखायी देता है; तथापि अभ्यासकी कमीके कारण पूर्व वासनाओंसे उनका ज्ञान दब जाता है और देह ही आत्मभावसे भासने लगता है तथा बीच-बीचमें उन्हें जगत्की सत्यताका भान भी हो जाता है ॥ ४३-४४ ॥ किन्तु उनके जो ज्ञानके संस्कार हैं वे पुनः उनकी इस असत् दृष्टिको दूर कर देते हैं। इस प्रकार उनके सत्य और मिथ्या ज्ञानके संस्कार परस्पर मिलकर बीच-बीचमें स्पष्ट फलका भोग कराते हैं ॥ ४५-४६ पू० ॥ ब्रह्मन् ! यद्यपि ये दोनों ही संस्कार समानरूपसे आते रहते हैं, तथा इनका प्रभाव एक-जैसा नहीं होता। ज्ञानकी वासना सत्यरूप है, इसलिये उससे दृश्यकी मिथ्या वासना बाधित हो जाती है; किन्तु दृश्यकी मिथ्या वासनासे सत्यवासना बाधित नहीं होती ॥४६ उ०-४७॥ विप्रवर ! जब वह मिथ्यावासनाके अधीन होकर शुद्ध वासनाको भूल जाता है तो उस मिथ्यावासनाको भ्रमरूप निश्चय करके त्याग

द्वाविंशोऽध्यायः । ३५७ विधूय वासनां सत्यामुपैति ब्राह्मणोत्तम । ततो न बाधिता सत्यवासना भवति क्वचित् ॥ ४९ ॥ मध्यमस्य विस्मृतिर्नो न मिथ्या ज्ञानमेव च । अविस्मृतस्येच्छयैव मिथ्याज्ञानं क्वचिद्भवेत् ॥ ५० ॥ सिद्धस्यैषा स्थितिः प्रोक्ता साधकस्योच्यते शृणु । यथा यथा तत्परः स्यात्तथाऽविस्मृतिरुच्छ्रिता ॥ ५१ ॥ पूर्णस्य विस्मृतिर्नास्ति मिथ्याज्ञानं प्रयत्नतः । उत्तमस्य पुनर्ब्रह्मन् समाधिव्यवहारयोः ॥ ५२ ॥ न भेदो लेशतोऽप्यस्ति यतोऽविस्मरणं सदा । यः समाधिपरो मध्यस्तस्य याऽविस्मृतिः स्थिता ॥ ५३ ॥ सैषा म्लाना भवेन्मिथ्याज्ञानभूमिषु भूसुर । यस्तूत्तमोऽपि स्याच्छन्द्यात्प्रारब्धवशतोऽवि वा ॥ ५४ ॥ देता है और सत्य ज्ञानवासनाको प्राप्त कर लेता है। इसके पश्चात् उसकी वह सत्यवासना फिर कभी बाधित नहीं होती ॥ ४८-४९ ॥ मध्यम ज्ञानीको सत्यवासनाकी विस्मृति नहीं होती और न मिथ्या ज्ञान ही होता है। वह सत्यवासनाको बिना भुलाये ही कभी-कभी स्वेच्छासे व्यवहारोपयोगी मिथ्या ज्ञानको स्वीकार कर लेता है ॥ ५० ॥ किन्तु यह स्थिति सिद्ध मध्यम ज्ञानीकी कही गयी है। अब साधककी बतलाता हूँ, सुनो। साधक जैसे-जैसे आत्मानुसन्धानमें तत्पर रहता है वैसे-वैसे उसे स्वरूपकी स्मृति बढ़ती जाती है। पूर्ण होनेपर तो स्वरूपकी विस्मृति होती ही नहीं और मिथ्या द्वैतका स्फुरण भी प्रयत्न करनेपर ही होता है ॥ ५१-५२ पू० ॥ ब्रह्मन् ! उत्तम ज्ञानीकी दृष्टिमें तो समाधि और व्यवहारका लेशमात्र भी भेद नहीं होता, क्योंकि उसे स्वरूपकी स्मृति सदा ही बनी रहती है ॥ ५२ उ०-५३ पू० ॥ जो समाधिनिष्ठ मध्यम ज्ञानी होता है उसे जो स्वरूपकी अविस्मृति रहती है, हे ब्राह्मण ! वह तो मिथ्या अज्ञानकी स्थिति आनेपर कुछ मन्द पड़ जाती है। किन्तु जो उत्तम ज्ञानी है वह