भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 360

३४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तेजस्विनं तपोमूर्त्तिं दृष्ट्वा ब्राह्मणरूपिणम् । पप्रच्छतू राजसुतौ को भवानिति शङ्कितौ ॥ १०९ ॥ अथ प्राह ब्राह्मण्यः स्ववृत्तं वै यथातथम् । अहं पुरा ब्राह्मणस्तु मगधेष्वभिविश्रुतः ॥ ११० ॥ वसुमानिति विख्यातः सर्वशास्त्रविशारदः । सभासु निर्जिता भूयो मया विद्याभिमानिना ॥ १११ ॥ विद्वांसः शतशो विप्रास्ततोत्यन्तसुगर्वितः । कदाचिन्मगधेशस्य सभायामष्टकं मुनिम् ॥ ११२ ॥ परावरज्ञं संशान्तं वादार्थी सङ्गतोऽभवम् । शुष्कतर्कैकनिपुण आत्मविद्याविचारणे ॥ ११३ ॥ ततो मया स आक्षिप्तः केवलं तर्कयुक्तिभिः । समाधानवचस्तस्य बह्वागमसुबृंहितम् ॥ ११४ ॥ दूषयित्वा तर्कजालैरधिक्षेपपरोऽभवम् । उसे एक तेजस्वी तपोमूर्त्ति ब्राह्मणके रूपमें देखकर उन राज- कुमारोंने शंकित होकर पूछा, "आप कौन हैं ?" ॥ १०६ ॥ तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने ज्योंका त्यों अपना वृत्तान्त सुनाया, "मैं पूर्वकालमें मगधदेशमें एक सुप्रसिद्ध ब्राह्मण था ॥ ११० ॥ मैं वसुमान् नामसे विख्यात और सभी शास्त्रोंमें कुशल था। विद्याका मुझे बड़ा अभिमान था और मैंने सभाओंमें सैकड़ों विद्वान् ब्राह्मणोंको अनेकों बार परास्त कर दिया था। इससे मैं अत्यन्त गर्वित हो गया था ॥ १११-११२ पू० ॥ मैं शास्त्रार्थके लिये तो उत्सुक रहता ही था और शुष्क तर्क करनेमें बहुत निपुण भी था। एक बार आत्मविद्याके विषयमें विचार करनेके प्रसंगसे मगधनरेशकी सभामें अष्टक मुनिसे मेरा समागम हो गया। वे परमात्मतत्त्वको जाननेवाले और अत्यन्त शान्त थे ॥११२ उ०-११३॥ उस समय मैं केवल शुष्कतर्ककी युक्तियोंसे उनका खण्डन करता रहा। उसके उत्तरमें उनका जो अनेकों शास्त्रोंसे प्रमाणित समाधान वचन होता था उसे अपने तर्कजालसे काटकर मैं बार-बार आक्षेप (खण्डन) ही करता रहा ॥ ११४-११५ पू० ॥