भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

एकविंशतितमोऽध्यायः । ३४५ निर्भयः सङ्गरहितो निर्दुःखो जितमानसः । ज्ञातज्ञेयस्त्वदीनात्मा शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०३ ॥ दुर्लक्ष्यः स्यात् को हि लोके विदेहो दृश्यते च कः । निष्क्रियस्य क्रिया का स्याद्वैतन्नृपनन्दन ॥ १०४ ॥ जीवन्मुक्तो हि दुर्लक्ष्यो विदेहो देहवानपि । तत्क्रिया निष्क्रियस्योक्ता शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०५ ॥ किमस्ति किं नास्ति लोके कोऽत्यन्तासम्भवो भवेत् । एतावदुक्त्वा नृपते मोचय द्रुतमग्रजम् ॥ १०६ ॥ दृगस्ति नास्ति वै दृश्यं व्यवहारो ह्यसम्भवी । उक्तमेतद्ब्रह्मरक्षो मुञ्च मद्‌भ्रातरं द्रुतम् ॥ १०७ ॥ श्रुत्वैतदथ सन्तुष्टो मुमोच ब्रह्मराक्षसः । रुक्माङ्गदं ततः पश्चादभवद्ब्राह्मणो हि सः ॥ १०८ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जिसकी किसीमें आसक्ति नहीं है, वह निर्भय रहता है, जिसका मनपर अधिकार है वह दुःखहीन रहता है और जिसने जाननेयोग्य वस्तुको जान लिया है उसमें दीनता नहीं रहती ॥ १०३ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि लोकमें जिसकी पहचान अत्यन्त कठिन है वह कौन है ? विदेह होकर भी दिखायी कौन देता है और निष्क्रियकी क्रिया क्या है ? ॥ १०४ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जीवन्मुक्तकी पहचान अत्यन्त कठिन है, वही देहवान् होकर भी विदेह है और उसकी क्रिया ही निष्क्रियकी क्रिया कही जाती है ॥ १०५ ॥ प्र०—लोकमें कौन-सी वस्तु है और कौन-सी नहीं है ? तथा अत्यन्त असम्भव क्या है ? राजन् ! बस, इतना बतला देनेपर मैं तुरन्त तुम्हारे भाईको छोड़ दूँगा ॥ १०६ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! द्रष्टा चेतन है और दृश्य नहीं है तथा व्यवहार असम्भव है। इस प्रकार मैंने तुम्हारे इस प्रश्नका भी उत्तर दे दिया अब तुरन्त मेरे भाईको छोड़ दो ॥ १०७ ॥ यह सब सुनकर ब्रह्मराक्षस बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने रुक्मा- ङ्गदको छोड़ दिया। उसके पश्चात् वह भी ब्राह्मण ही हो गया ॥ १०८ ॥