त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्र वा किं निदानं स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९६ ॥ देवतानुग्रहात् सर्वं भक्त्या सा हि समाप्यते । निदानं सत्सङ्ग एव शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९७ ॥ का देवता च सम्प्रोक्ता का च सा भक्तिरुच्यते । सन्तश्च कीदृशाः प्रोक्ता वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९८ ॥ देवता स्याज्जगद्धात्री भक्तिस्तत्परतोच्यते । सन्तः शान्ता दयावन्तः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९९ ॥ सदा बिभेति को लोके सदा दुःखपरोऽपि कः । सदा दैन्ययुतः को वा वदैतन्नृपनन्दन ॥ १०० ॥ रू धनी सदा भीतो दुःखी बहुकुटुम्बवान् । आशाग्रस्तः सदा दीनः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०१ ॥ निर्भयः को भवेल्लोके निर्दुःखश्चापि को भवेत् । अदीनः सर्वदा कः स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ १०२ ॥ साधन भी किस प्रकार प्राप्त होंगे तथा उसका भी मूल कारण क्या है ॥ ९६ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, ये सब भगवत्कृपासे हो सकते हैं, भग- वत्कृपा भक्तिसे प्राप्त होती है और उसका भी मूल सत्संग है ॥ ९७ ॥ प्र०—राजकुमार ! बताओ, भगवान् किसे कहते हैं ? भक्ति क्या कही जाती है और संत किन लोगोंको कहा जाता है ? ॥ ९८ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जो जगत्को धारण करनेवाला है वह भगवान् है । उन्हींमें मन लगा देना भक्ति है तथा शान्त और दयावान् पुरुष सन्त होते हैं ॥ ९९ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि संसारमें सर्वदा कौन डरता रहता है ? कौन दुःखमें डूबा रहता है ? और कौन दीनतामें फँसा हुआ है ? ॥ १०० ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जो बहुत अधिक धनी होता है वह सदा डरता रहता है, अधिक कुटुम्बवाला दुःखी रहता है और आशाओंमें फँसा हुआ सदा दीन रहता है ॥ १०१ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ, लोकमें निर्भय कौन हो सकता है, दुःखहीन कौन है और सर्वदा दैन्यशून्य कौन रहता है ? ॥ १०२ ॥