त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
३४४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्र वा किं निदानं स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९६ ॥ देवतानुग्रहात् सर्वं भक्त्या सा हि समाप्यते । निदानं सत्सङ्ग एव शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९७ ॥ का देवता च सम्प्रोक्ता का च सा भक्तिरुच्यते । सन्तश्च कीदृशाः प्रोक्ता वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९८ ॥ देवता स्याज्जगद्धात्री भक्तिस्तत्परतोच्यते । सन्तः शान्ता दयावन्तः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९९ ॥ सदा बिभेति को लोके सदा दुःखपरोऽपि कः । सदा दैन्ययुतः को वा वदैतन्नृपनन्दन ॥ १०० ॥ रू धनी सदा भीतो दुःखी बहुकुटुम्बवान् । आशाग्रस्तः सदा दीनः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०१ ॥ निर्भयः को भवेल्लोके निर्दुःखश्चापि को भवेत् । अदीनः सर्वदा कः स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ १०२ ॥ साधन भी किस प्रकार प्राप्त होंगे तथा उसका भी मूल कारण क्या है ॥ ९६ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, ये सब भगवत्कृपासे हो सकते हैं, भग- वत्कृपा भक्तिसे प्राप्त होती है और उसका भी मूल सत्संग है ॥ ९७ ॥ प्र०—राजकुमार ! बताओ, भगवान् किसे कहते हैं ? भक्ति क्या कही जाती है और संत किन लोगोंको कहा जाता है ? ॥ ९८ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जो जगत्को धारण करनेवाला है वह भगवान् है । उन्हींमें मन लगा देना भक्ति है तथा शान्त और दयावान् पुरुष सन्त होते हैं ॥ ९९ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि संसारमें सर्वदा कौन डरता रहता है ? कौन दुःखमें डूबा रहता है ? और कौन दीनतामें फँसा हुआ है ? ॥ १०० ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जो बहुत अधिक धनी होता है वह सदा डरता रहता है, अधिक कुटुम्बवाला दुःखी रहता है और आशाओंमें फँसा हुआ सदा दीन रहता है ॥ १०१ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ, लोकमें निर्भय कौन हो सकता है, दुःखहीन कौन है और सर्वदा दैन्यशून्य कौन रहता है ? ॥ १०२ ॥
एकविंशतितमोऽध्यायः । ३४५ निर्भयः सङ्गरहितो निर्दुःखो जितमानसः । ज्ञातज्ञेयस्त्वदीनात्मा शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०३ ॥ दुर्लक्ष्यः स्यात् को हि लोके विदेहो दृश्यते च कः । निष्क्रियस्य क्रिया का स्याद्वैतन्नृपनन्दन ॥ १०४ ॥ जीवन्मुक्तो हि दुर्लक्ष्यो विदेहो देहवानपि । तत्क्रिया निष्क्रियस्योक्ता शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०५ ॥ किमस्ति किं नास्ति लोके कोऽत्यन्तासम्भवो भवेत् । एतावदुक्त्वा नृपते मोचय द्रुतमग्रजम् ॥ १०६ ॥ दृगस्ति नास्ति वै दृश्यं व्यवहारो ह्यसम्भवी । उक्तमेतद्ब्रह्मरक्षो मुञ्च मद्भ्रातरं द्रुतम् ॥ १०७ ॥ श्रुत्वैतदथ सन्तुष्टो मुमोच ब्रह्मराक्षसः । रुक्माङ्गदं ततः पश्चादभवद्ब्राह्मणो हि सः ॥ १०८ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जिसकी किसीमें आसक्ति नहीं है, वह निर्भय रहता है, जिसका मनपर अधिकार है वह दुःखहीन रहता है और जिसने जाननेयोग्य वस्तुको जान लिया है उसमें दीनता नहीं रहती ॥ १०३ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि लोकमें जिसकी पहचान अत्यन्त कठिन है वह कौन है ? विदेह होकर भी दिखायी कौन देता है और निष्क्रियकी क्रिया क्या है ? ॥ १०४ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जीवन्मुक्तकी पहचान अत्यन्त कठिन है, वही देहवान् होकर भी विदेह है और उसकी क्रिया ही निष्क्रियकी क्रिया कही जाती है ॥ १०५ ॥ प्र०—लोकमें कौन-सी वस्तु है और कौन-सी नहीं है ? तथा अत्यन्त असम्भव क्या है ? राजन् ! बस, इतना बतला देनेपर मैं तुरन्त तुम्हारे भाईको छोड़ दूँगा ॥ १०६ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! द्रष्टा चेतन है और दृश्य नहीं है तथा व्यवहार असम्भव है। इस प्रकार मैंने तुम्हारे इस प्रश्नका भी उत्तर दे दिया अब तुरन्त मेरे भाईको छोड़ दो ॥ १०७ ॥ यह सब सुनकर ब्रह्मराक्षस बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने रुक्मा- ङ्गदको छोड़ दिया। उसके पश्चात् वह भी ब्राह्मण ही हो गया ॥ १०८ ॥
३४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तेजस्विनं तपोमूर्त्तिं दृष्ट्वा ब्राह्मणरूपिणम् । पप्रच्छतू राजसुतौ को भवानिति शङ्कितौ ॥ १०९ ॥ अथ प्राह ब्राह्मण्यः स्ववृत्तं वै यथातथम् । अहं पुरा ब्राह्मणस्तु मगधेष्वभिविश्रुतः ॥ ११० ॥ वसुमानिति विख्यातः सर्वशास्त्रविशारदः । सभासु निर्जिता भूयो मया विद्याभिमानिना ॥ १११ ॥ विद्वांसः शतशो विप्रास्ततोत्यन्तसुगर्वितः । कदाचिन्मगधेशस्य सभायामष्टकं मुनिम् ॥ ११२ ॥ परावरज्ञं संशान्तं वादार्थी सङ्गतोऽभवम् । शुष्कतर्कैकनिपुण आत्मविद्याविचारणे ॥ ११३ ॥ ततो मया स आक्षिप्तः केवलं तर्कयुक्तिभिः । समाधानवचस्तस्य बह्वागमसुबृंहितम् ॥ ११४ ॥ दूषयित्वा तर्कजालैरधिक्षेपपरोऽभवम् । उसे एक तेजस्वी तपोमूर्त्ति ब्राह्मणके रूपमें देखकर उन राज- कुमारोंने शंकित होकर पूछा, "आप कौन हैं ?" ॥ १०६ ॥ तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने ज्योंका त्यों अपना वृत्तान्त सुनाया, "मैं पूर्वकालमें मगधदेशमें एक सुप्रसिद्ध ब्राह्मण था ॥ ११० ॥ मैं वसुमान् नामसे विख्यात और सभी शास्त्रोंमें कुशल था। विद्याका मुझे बड़ा अभिमान था और मैंने सभाओंमें सैकड़ों विद्वान् ब्राह्मणोंको अनेकों बार परास्त कर दिया था। इससे मैं अत्यन्त गर्वित हो गया था ॥ १११-११२ पू० ॥ मैं शास्त्रार्थके लिये तो उत्सुक रहता ही था और शुष्क तर्क करनेमें बहुत निपुण भी था। एक बार आत्मविद्याके विषयमें विचार करनेके प्रसंगसे मगधनरेशकी सभामें अष्टक मुनिसे मेरा समागम हो गया। वे परमात्मतत्त्वको जाननेवाले और अत्यन्त शान्त थे ॥११२ उ०-११३॥ उस समय मैं केवल शुष्कतर्ककी युक्तियोंसे उनका खण्डन करता रहा। उसके उत्तरमें उनका जो अनेकों शास्त्रोंसे प्रमाणित समाधान वचन होता था उसे अपने तर्कजालसे काटकर मैं बार-बार आक्षेप (खण्डन) ही करता रहा ॥ ११४-११५ पू० ॥
एकविंशतितमोऽध्यायः। ३४७ अधिक्षिप्तोऽपि बहुधा मया राजसभागतः ॥ ११५ ॥ शान्तस्तूष्णीं बभूवाथ शिष्यस्तस्य महात्मनः। काश्यपो मां क्रोधवशाच्छशाप नृपसंसदि ॥ ११६ ॥ आचार्यं मेऽधिक्षिपसि त्वमस्थाने द्विजाधम। यतस्तस्माच्चिरं कालं ब्रह्मरक्षो भविष्यसि ॥ ११७ ॥ शप्त एवमहं तेन भीतोऽत्यन्तं तदा मुनिम्। वेपमानः प्रणम्याशु चाष्टकं शरणं गतः ॥ ११८ ॥ मयि सोऽथ दयाञ्चक्रे विरोधिन्यपि शान्तधीः। शापस्यान्तं ददौ मह्यं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ११९ ॥ प्रश्नांस्त्वयापि हि कृतान् प्रत्युक्तांश्च मया हि तान्। स्थापितान् केवलैस्तर्कैर्यदेकः प्रतिवक्ष्यति ॥ १२० ॥ कश्चिद्विद्वांस्तदा शापाद्विमुक्तस्त्वं भविष्यसि। तच्छापादथ ते मुक्तश्चिराय नृपनन्दन ॥ १२१ ॥ राजसभा में मेरे द्वारा बार-बार आक्षेप किये जानेपर भी वे शान्त और मौन ही रहे। तब उन महात्माके काश्यप नामक शिष्यने क्रोधातुर हो उस राजसभामें मुझे शाप दिया ॥ ११५ उ०-११६ ॥ “अरे ब्राह्मणाधम ! तू अकारण ही मेरे गुरुदेवका अनादर कर रहा है, इसलिये तू दीर्घकालतक ब्रह्मराक्षस रहेगा” ॥ ११७ ॥ उसका ऐसा शाप होनेपर मैं बड़ा भयभीत हुआ और काँपते हुए उन अष्टक मुनिको प्रणाम कर उन्हींकी शरणमें गया ॥ ११८ ॥ मुनि शान्तचित्त थे, अतः विरोधी होनेपर भी मुनिने मुझपर दया की। उन्होंने उस शापका जो अन्त निश्चित किया वह मैं बतलाता हूँ, सुनो ॥ ११९ ॥ तुमने मुझसे जो प्रश्न किये और मेरे समाधान करनेपर भी तुमने केवल तर्कके बलसे उन्हें खड़े रखा, उनका जब कोई एक ही विद्वान् समाधान कर देगा, उस समय तुम इस शापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १२०-१२१ पू० ॥ राजकुमार ! अब बहुत समय बीतनेपर तुमने मुझे उस शापसे
३४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तच्चां मन्ये महात्मानं ज्ञातज्ञेयं नृपूत्तमम् । इत्युक्तस्तेन विप्रेण विस्मितोऽभून्नृपात्मजः ॥ १२२ ॥ ततो भूयो नृपसुतोऽनुयुक्तस्तेन सर्वशः । वसुमन्तं बोधयित्वा सम्यक् प्रागात् पुरं स्वकम् ॥ १२३ ॥ प्रणम्य वसुमन्तं तं सहितो भ्रातृसैनिकैः । एतत्ते सर्वमाख्यातं यत् पृष्टं भार्गव त्वया ॥ १२४ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे रक्षसोपाख्यानं एकविंशतितमोऽध्यायः । छुड़ाया है। अतः मैं तुम्हें महात्मा, ज्ञातज्ञेय और राजाओंमें श्रेष्ठ समझता हूँ॥ १२१ उ०-१२२ पू० ॥ उस ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजकुमारको बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पुनः प्रश्न किये और राजकुमारने सब प्रकार वसुमान्का समाधान किया। फिर वह वसुमान्को प्रणाम कर अपने भाई तथा सैनिकोंके सहित अपने नगरको चला गया। परशुराम ! तुमने जो कुछ पूछा था वह सब मैंने तुमसे कह दिया ॥ १२२ उ०-१२४ ॥ एकविंशतितम अध्याय समाप्त।
द्वांविशोऽध्यायः श्रुत्वैवं राक्षसकथां रामो भृगुकुलोद्भवः । पुनः पप्रच्छावधूतकुलेशं प्रश्रयाश्रयः ॥ १ ॥ भगवन् किं तेन पृष्टं शापमुक्तद्विजेन वै । हेमाङ्गदेन किं प्रोक्तमेतन्मे कृपया वद ॥ २ ॥ कौतुक्यत्यन्तमत्राहं न तदल्पं भवेत् क्वचित् । इति पृष्टः पुनः प्राह दत्तात्रेयो दयापरः ॥ ३ ॥ राम तत्ते प्रवक्ष्यामि महार्थं तत् प्रभाषितम् । ततः पप्रच्छ वसुमान् हेमाङ्गदमुपस्थितम् ॥ ४ ॥ राजपुत्र किञ्चिदहं पृच्छामि त्वं समीरय । अहमष्टकयोगीशात्तद्ज्ञासिषमादितः ॥ ५ ॥ द्वांविशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ वसुमानका समाधान, ग्रन्थका सारांश इस प्रकार राक्षसकी कथा सुनकर भृगुकुलमें अवतीर्ण श्रीपरशु- रामजीने विनयावनत हो अवधूतशिरोमणि श्रीदत्तात्रेयजीसे पुनः पूछा ॥ १ ॥ "भगवन् ! शापसे मुक्त हुए उस ब्राह्मणने क्या पूछा था और हेमाङ्गदने उसका क्या उत्तर दिया, कृपापूर्वक यह मुझसे कहिये ॥ २ ॥ इस विषयमें मुझे बड़ा कौतूहल है, वह कोई छोटी बात कभी नहीं हो सकती। ऐसा प्रश्न होनेपर श्रीदत्तात्रेयजीने दयालु होकर पुनः कहना आरम्भ किया—॥ ३ ॥ "परशुराम ! वह सम्भाषण बड़े गम्भीर अर्थसे भरा हुआ है, मैं तुम्हें सुनाता हूँ। तब वसुमान्ने समीप ही बैठे हुए हेमाङ्गदसे पूछा—॥ ४ ॥ "राजपुत्र ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, आप वर्णन करें। आरम्भमें मैंने योगिराज अष्टकसे यह तत्त्व जाना था ॥ ५ ॥
३५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भूयस्त्वदुक्त्या च सम्यग् विदितं परमं पदम् । किन्तु ते ज्ञाततत्त्वस्य कथं स्थितिरियं भवेत् ॥ ६ ॥ कथं ज्ञातसुविज्ञेयो व्यवहारपरायणः । ध्वान्तप्रकाशयोर्यद्वत् स्थितिरेकत्र सम्भवेत् ॥ ७ ॥ एतन्मे राजतनय ब्रूहि सम्यग् यथास्थितम् । इत्यापृष्टः प्राह हेमाङ्गदस्तं ब्राह्मणोत्तमम् ॥ ८ ॥ ब्रह्मन् ते भ्रान्तिरद्यापि न सम्यक् प्रविनाशिता । व्यवहारेण किं ज्ञानं बाध्यते स्वात्मसम्भवम् ॥ ९ ॥ व्यवहारवशाज्ज्ञानं बाध्यते च ततः कथम् । पुरुषार्थस्य लाभः स्यात् स्वप्नज्ञानसमेन वै ॥ १० ॥ सर्वोऽपि व्यवहारोऽयं ज्ञानमाश्रित्य सम्भवेत् । तज्ज्ञानं बाध्यते तेन कथं तन्मे समीरय ॥ ११ ॥ अब आपके कथनसे मुझे पुनः उस परम पदका अच्छी तरह ज्ञान हो गया। किन्तु तत्त्वज्ञ होनेपर भी आपकी ऐसी स्थिति क्यों होनी चाहिये ? ॥ ६ ॥ जिसने ज्ञेय तत्त्वको जान लिया है वह व्यवहारमें कैसे लगा रह सकता है ? यह तो ऐसी ही बात होगी जैसे अन्धकार और प्रकाशकी स्थिति एक जगह हो जाय ॥ ७ ॥ राजकुमार ! इसमें जो भी कारण हो वह मुझे ज्योंका त्यों समझाकर कहिये।" ऐसा पूछा जानेपर हेमाङ्गदने उस विप्रश्रेष्ठसे कहा—॥ ८ ॥ "ब्रह्मन् ! आपका भ्रम अभी अच्छी तरह निवृत्त नहीं हुआ है। क्या अपने ही आत्मस्वरूपसे रहनेवाला ज्ञान व्यवहारसे बाधित हो जाता है ? ॥ ९ ॥ यदि व्यवहारके कारण; ज्ञान बाधित हो जाय तब तो स्वप्नमें होनेवाले ज्ञानके समान हुआ। उससे मोक्षरूप पुरुषार्थकी प्राप्ति कैसे हो सकेगी ? ॥ १० ॥ यह सारा व्यवहार तो ज्ञानके आश्रयसे ही होता है। फिर उसीसे वह बाधित कैसे हो जायगा—यह मुझे बताओ ॥ ११ ॥
द्वाविंशोऽध्यायः । ३५१ ज्ञानं तदेव हि भवेद् यत्रेदं भासते जगत् । सङ्कल्पाद् व्यवहारो हि ज्ञाने सर्वं प्रकाशते ॥ १२ ॥ असङ्कल्पेन तद्रूपमनुलक्ष्य धिया सकृत् । कृतार्थो बन्धनिर्मुक्तो भवतीति सुनिश्चयः ॥ १३ ॥ तस्माद् ब्रह्मन् ते प्रश्नः सम्मतोऽयं सुबुद्धिभिः । पुनस्तं प्राह वसुमान् नृपसूनुं महाशयम् ॥ १४ ॥ सत्यं राजकुमारैतन्मयापीत्थं सुनिश्चितम् । स्वरूपं निर्विकल्पं हि संवेदनमिहोच्यते ॥ १५ ॥ सविकल्पत्वमापन्ने पुनर्भ्रान्तिः कुतो न हि । विकल्प एव हि भ्रान्तिर्यथा रज्जौ भुजङ्गमः ॥ १६ ॥ शृणु ब्रह्मन् न जानासि भ्रमाभ्रमविनिर्णयम् । गगने नीलिमा भाति गगनं जानतामपि ॥ १७ ॥ व्यवहारं च कुर्वन्ति नीलं नभ इति क्वचित् । जिसमें यह जगत् भास रहा है वही तो ज्ञान है । केवल संकल्पके द्वारा ज्ञानमें ही तो सारे व्यवहारका भास होता है ॥ १२ ॥ हाँ, यह बात बिलकुल निश्चित है कि निःसंकल्प हो जानेसे बुद्धिके द्वारा एक बार उस आत्मस्वरूपको लख लेनेपर जीव बन्धनसे मुक्त होकर कृतार्थ हो जाता है ॥ १३ ॥ इसलिये ब्रह्मन् ! आपका यह प्रश्न श्रेष्ठ बुद्धिवालोंको मान्य नहीं है ।” तब वसुमान्ने उस उदारचित्त राजकुमारसे पुनः कहा—॥ १४ ॥ “राजकुमार ! यह बात ठीक है और मैंने भी ऐसा ही निश्चय किया है । वास्तवमें अपना निर्विकल्प स्वरूप ही शुद्धचिति कहा गया है ॥ १५ ॥ किन्तु यदि वह विकल्पयुक्त हो जाय तो पुनः भ्रान्ति क्यों नहीं होगी ? क्योंकि जैसे रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है वैसे विकल्प ही तो भ्रान्ति है” ॥ १६ ॥ [ राजपुत्र— ] “ब्रह्मन् ! सुनो, आप तो भ्रम और भ्रमहीनताका निर्णय करना भी नहीं जानते । जो लोग आकाशको जानते हैं उन्हें भी उसमें नीलिमा तो दिखायी देती ही है । और वे ‘आकाश नीला
३५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तावतैव तु तज्ज्ञानं न भ्रान्तिरभिधीयते ॥ १८ ॥ अतत्त्वज्ञे हि सा भ्रान्तिस्तत्त्वज्ञे सा प्रमैव हि । हतप्रामाण्यजीवं तज्ज्ञानं मृतमहाहिवत् ॥ १९ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बस्य व्यवहारसमो भवेत् । अभिज्ञस्यानभिज्ञस्य चाप्यतोऽस्ति भिदा तयोः ॥ २० ॥ ज्ञस्य प्रमैव तज्ज्ञानमज्ञस्य तु भ्रमात्मकम् । ज्ञानिनां ज्ञानमेव स्यात् सर्वोऽपि व्यवहारकः ॥ २१ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बानां व्यवहारेण सम्मितः । अभिज्ञानामतो भूयो न हि भ्रान्तेः समुद्भवः ॥ २२ ॥ केवलाज्ञानजनितं ज्ञानेन विनिवर्त्तते । दोषेण जनितं कस्माद्विलीयेज्ज्ञानमात्रतः ॥ २३ ॥ है,' ऐसा बोलकर कभी व्यवहार भी करते ही हैं। किन्तु इतनेसे ही उनका वह ज्ञान भ्रान्ति तो नहीं कहा जाता ॥ १७-१८ ॥ अज्ञानीमें तो आकाशकी नीलिमाका ज्ञान भ्रान्ति ही है, किन्तु तत्त्वज्ञमें तो वह प्रमा ही है। उनका वह ज्ञान प्रामाण्यरूप जीवनसे रहित होनेके कारण मरे हुए सर्पके समान किसी अनर्थका कारण नहीं होता ॥ १९ ॥ ज्ञानियोंका व्यवहार दर्पणके प्रतिबिम्बकी हलचलके समान होता है। अतः ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनोंके व्यवहारमें भेद तो है ही ॥ २० ॥ वह व्यवहारसम्बन्धी ज्ञान ज्ञानीकी तो प्रमा है और अज्ञानीका भ्रम है। ज्ञानियोंके लिये तो सारा व्यवहार भी ज्ञानस्वरूप ही है ॥ २१ ॥ उनके लिये वह दर्पणमें भासनेवाले प्रतिबिम्बोंके व्यवहारके समान होता है । इसलिये ज्ञानियोंको पुनः भ्रान्ति की उत्पत्ति नहीं हो सकती ॥ २२ ॥ ज्ञानसे तो उसीकी निवृत्ति होती है जो केवल अज्ञानसे उत्पन्न हुआ हो। किन्तु जिसकी उत्पत्ति किसी अन्य दोषके कारण हुई हो वह केवल ज्ञानसे कैसे लीन हो सकता है ? ॥ २३ ॥
द्वाविंशोऽध्यायः । ३५३ अत एव तैमिरिकः पश्येज्जानन्नपि द्वयम् । जगदाभास एषस्तु कर्मदोषसमुद्भवः ॥ २४ ॥ तस्मादाकर्मविलयं व्यवहारो न लीयते । समाप्ते कर्मणि ततः शिष्येदद्वयचिन्मयम् ॥ २५ ॥ तस्मान्नास्त्येव विज्ञानं कदापि भ्रान्तिसम्भवः । इति श्रुत्वा पुनर्विप्रः पप्रच्छ नृपनन्दनम् ॥ २६ ॥ अहो नृपात्मज कथं ज्ञानिनां कर्म सम्भवेत् । ज्ञानाग्निसंस्पर्शनेऽपि कर्मतूलः कथं स्थितः ॥ २७ ॥ अथाह हेमाङ्गदोऽपि विप्रं तं नृपनन्दन । ब्रह्मन् शृणु प्रवक्ष्यामि त्रिविधं कर्म ज्ञानिनाम् ॥ २८ ॥ सर्वेषाञ्च समानं स्यादपक्वं पक्वमेव च । हतोदितं चेति तत्र नश्येज्ज्ञानादमध्यमम् ॥ २९ ॥ कर्मणा पाचकः कालो नियत्या नियतः स्थितः । यही कारण है कि तिमिर रोगवाला व्यक्ति यह जानते हुए भी कि पदार्थ एक है उसे दो रूपमें देखता है। यह जगत्की प्रतीति तो प्रारब्ध कर्मरूप दोषसे उत्पन्न हुई है। इसलिये जबतक प्रारब्धक्षय नहीं होता तबतक व्यवहारका भी लय नहीं होता। प्रारब्धकर्म समाप्त होनेपर तो केवल अद्वय चिन्मात्र तत्त्व ही रह जाता है ॥ २४-२५ ॥ इसलिये विज्ञानमें भ्रान्तिकी उत्पत्ति कभी नहीं हो सकती।” ऐसा सुनकर उस ब्राह्मणने राजकुमारसे पुनः पूछा—॥ २६ ॥ “हे राजकुमार ! ज्ञानीके द्वारा भला कर्म कैसे हो सकता है? ज्ञानाग्निका स्पर्श हो जानेपर भी कर्मरूपी कपास कैसे रह सकती है?” ॥ २७ ॥ तब राजकुमार हेमाङ्गदने भी उस ब्राह्मणसे कहा, “ब्रह्मन् ! सुनो, मैं बतलाता हूं । सभी ज्ञानियोंके कर्म समानरूपसे तीन प्रकारके होते हैं—अपक्व, पक्व और हतोदित। इनमेंसे मध्यम (पक्व) को छोड़कर शेष दो नष्ट हो जाते हैं' ॥ २८-२९ ॥ नियति (विधाता) ने कालको कर्मोंका परिपाक करनेवाला नियुक्त
३५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कालेन पाचितप्रायं पक्वं कर्म समीरितम् ॥ ३० ॥ अपाचितमपक्वं स्याज्ज्ञानोत्पत्तेरनन्तरम् । कृतं हतोदितं विद्धि ज्ञानाद्धतसमुद्भवात् ॥ ३१ ॥ तत्र पक्वं तु यत् कर्म तदारब्धमितीर्यते । आवेगं मुक्तशरवत्तिष्ठत्येव फलप्रदम् ॥ ३२ ॥ तन्मूलको जगद्भासो ज्ञानस्य तारतम्यतः । स्थितोऽपि भ्रान्तितुल्योपि न भ्रान्तिः फलभेदतः ॥ ३३ ॥ जनयेत्तत्कालफलं मन्दज्ञानवतां स्फुटम् । मध्यानामस्फुटं तच्च ज्ञानिनां फलभासनम् ॥ ३४ ॥ उत्तमानान्तु तत्कालफलञ्च स्पष्टभासनम् । शशशृङ्गसमं ब्रह्मन् न हि तत्फलमुच्यते ॥ ३५ ॥ अज्ञानिनां कर्मफलं पुष्टं पूर्णानुसन्धितः । किया है। जो कर्म कालके द्वारा प्रायः परिपक्व (फलोन्मुख) कर दिये जाते हैं वे 'पक्व' कर्म कहे गये हैं ॥ ३० ॥ जो परिपक्व नहीं हुए हैं वे 'अपक्व' हैं और जो ज्ञानोत्पत्तिके पीछे किये जाते हैं उन्हें 'हतोदित' समझो, क्योंकि वे ज्ञानसे हत हुए ही उत्पन्न होते हैं ॥ ३१ ॥ इनमें जो पक्व कर्म हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं। वे छोड़े हुए बाणके समान अपना वेग रहनेतक फल प्रदान करते ही हैं ॥ ३२ ॥ ज्ञानकी न्यूनाधिकताके अनुसार उन्हींके कारण जगत्की प्रतीति बनी रहती है। वह जगत्प्रतीति भ्रान्तिके समान होनेपर भी फलमें भेद रहनेके कारण भ्रान्ति नहीं है ॥ ३३ ॥ मन्द ज्ञानियोंको यह प्रारब्ध तत्काल स्पष्ट फल प्रदान करता है। और मध्यम ज्ञानियोंको वह फलका भास अस्पष्ट होता है ॥ ३४ ॥ उत्तम ज्ञानियोंको फलका भास तत्काल एवं स्पष्ट तो होता है, किन्तु ब्रह्मन् ! उनकी दृष्टिमें वह शशशृंगके समान असत् होनेके कारण फल कहा नहीं जाता ॥ ३५ ॥ अज्ञानियोंको तो कर्मफलका अनुसन्धान पहले हीसे बना रहता है,
द्वाविंशोऽध्यायः । ३५५ पूर्वापरानुसन्धानात् पोषितं तत्फलन्तु तैः ॥ ३६ ॥ ज्ञानिनां फलसन्धानं छिन्नमात्मानुसन्धितः । अतो न पुष्टं मन्दानामारब्धजनितं फलम् ॥ ३७ ॥ मध्यानां ज्ञानिनां तच्च फलं मन्दसुषुप्तिषु । मशकादिकृतं दुःखमिव तत् सूक्ष्मतां गतम् ॥ ३८ ॥ उत्तमज्ञानिनां तत्तु फलं पूर्णमपि स्थितम् । दग्धरज्जुरिव भवेत् स्थितात्मज्ञानवैभवात् ॥ ३९ ॥ यथा नाटकवृत्तेषु नरो वेषान्तरं गतः । हृष्यन् विषीदंश्च भूयो नान्तर्विकृतिमाप्नुयात् ॥ ४० ॥ एवमेष स्थितज्ञानी सुपूर्णफलसङ्गतः । न फलैः स्पृश्यते तस्मात्तत्फलं शशशृङ्गवत् ॥ ४१ ॥ अज्ञानिभिस्तु शुद्धात्मा नोपलक्षित एव हि । इसलिये वह पुष्ट होता है। पूर्वापरका अनुसन्धान रहनेके कारण वे उस फलका पोषण करते रहते हैं ॥ ३६ ॥ ज्ञानियोंको आत्माका अनुसन्धान होता रहनेसे बीच-बीचमें उनका फलानुसन्धान टूटता रहता है। इसीसे मन्द ज्ञानियोंका प्रारब्धजनित फल पुष्ट नहीं होता ॥ ३७ ॥ मध्यम ज्ञानियोंके लिये तो वह फल, हल्की सुषुप्तिमें मच्छर आदिके काटनेसे होनेवाले दुःखके समान बहुत कम दुःख देता है ॥ ३८ ॥ उत्तम ज्ञानियोंको वह कर्मफल पूर्णतया प्राप्त होनेपर भी स्थिर आत्मज्ञानके प्रभावसे जली हुई रस्सीके समान केवल प्रतीतिमात्र रहता है ॥ ३६ ॥ जिसप्रकार नाटकमें अभिनय करते समय पुरुष अन्य वेष धारण करके हर्ष और शोककी भूमिका करनेपर भी भीतरसे किसी प्रकारके विकारको प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार यह निष्ठावान् ज्ञानी पूर्णतया फलका संग प्राप्त होनेपर भी उससे स्पृष्ट नहीं होता। इसलिये उसका वह फलभोग शशशृंगके समान केवल कथनमात्र ही होता है ॥ ४०-४१ ॥ अज्ञानियोंको तो शुद्ध आत्माका पता ही नहीं होता, इसलिये वे तो
३५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतो देहात्मभूतास्ते दृश्यसत्त्वविमर्शनाः ॥ ४२ ॥ मन्दज्ञानिभिरात्मा तु विदितः शुद्धचिन्मयः । जगच्चासत्यतो दृष्टं तथाप्यभ्यासमान्द्यतः ॥ ४३ ॥ प्राग्वासनाहृतज्ञानास्ते देहात्मप्रभासनम् । जगतः सत्यताभासं मध्ये मध्ये समाययुः ॥ ४४ ॥ भूयो ज्ञानवासना या विधुन्वन्त्यसतीं दृशम् । वासनैवं सत्यमिथ्याज्ञानयोश्च परस्परम् ॥ ४५ ॥ मिलिता मन्दज्ञानिनामतो मध्ये फलं स्फुटम् । समेऽपि वासने चैते न हि तुल्ये महीसुर ॥ ४६ ॥ सत्यज्ञानवासनया बाध्यते वासना परा । न च मिथ्या वासनया बाध्यते सत्यवासना ॥ ४७ ॥ मिथ्यावासनयाविष्टो विस्मृतः केवलां परः । ततो मिथ्यावासनां तु विनिश्चित्य भ्रमात्मिकाम् ॥ ४८ ॥ देहको ही आत्मा समझते हैं और दृश्यको भी सत्य ही मानते हैं ॥४२॥ मन्द ज्ञानियोंको शुद्ध चिन्मय आत्माका ज्ञान होता है और उन्हें जगत् भी असत्य दिखायी देता है; तथापि अभ्यासकी कमीके कारण पूर्व वासनाओंसे उनका ज्ञान दब जाता है और देह ही आत्मभावसे भासने लगता है तथा बीच-बीचमें उन्हें जगत्की सत्यताका भान भी हो जाता है ॥ ४३-४४ ॥ किन्तु उनके जो ज्ञानके संस्कार हैं वे पुनः उनकी इस असत् दृष्टिको दूर कर देते हैं। इस प्रकार उनके सत्य और मिथ्या ज्ञानके संस्कार परस्पर मिलकर बीच-बीचमें स्पष्ट फलका भोग कराते हैं ॥ ४५-४६ पू० ॥ ब्रह्मन् ! यद्यपि ये दोनों ही संस्कार समानरूपसे आते रहते हैं, तथा इनका प्रभाव एक-जैसा नहीं होता। ज्ञानकी वासना सत्यरूप है, इसलिये उससे दृश्यकी मिथ्या वासना बाधित हो जाती है; किन्तु दृश्यकी मिथ्या वासनासे सत्यवासना बाधित नहीं होती ॥४६ उ०-४७॥ विप्रवर ! जब वह मिथ्यावासनाके अधीन होकर शुद्ध वासनाको भूल जाता है तो उस मिथ्यावासनाको भ्रमरूप निश्चय करके त्याग
द्वाविंशोऽध्यायः । ३५७ विधूय वासनां सत्यामुपैति ब्राह्मणोत्तम । ततो न बाधिता सत्यवासना भवति क्वचित् ॥ ४९ ॥ मध्यमस्य विस्मृतिर्नो न मिथ्या ज्ञानमेव च । अविस्मृतस्येच्छयैव मिथ्याज्ञानं क्वचिद्भवेत् ॥ ५० ॥ सिद्धस्यैषा स्थितिः प्रोक्ता साधकस्योच्यते शृणु । यथा यथा तत्परः स्यात्तथाऽविस्मृतिरुच्छ्रिता ॥ ५१ ॥ पूर्णस्य विस्मृतिर्नास्ति मिथ्याज्ञानं प्रयत्नतः । उत्तमस्य पुनर्ब्रह्मन् समाधिव्यवहारयोः ॥ ५२ ॥ न भेदो लेशतोऽप्यस्ति यतोऽविस्मरणं सदा । यः समाधिपरो मध्यस्तस्य याऽविस्मृतिः स्थिता ॥ ५३ ॥ सैषा म्लाना भवेन्मिथ्याज्ञानभूमिषु भूसुर । यस्तूत्तमोऽपि स्याच्छन्द्यात्प्रारब्धवशतोऽवि वा ॥ ५४ ॥ देता है और सत्य ज्ञानवासनाको प्राप्त कर लेता है। इसके पश्चात् उसकी वह सत्यवासना फिर कभी बाधित नहीं होती ॥ ४८-४९ ॥ मध्यम ज्ञानीको सत्यवासनाकी विस्मृति नहीं होती और न मिथ्या ज्ञान ही होता है। वह सत्यवासनाको बिना भुलाये ही कभी-कभी स्वेच्छासे व्यवहारोपयोगी मिथ्या ज्ञानको स्वीकार कर लेता है ॥ ५० ॥ किन्तु यह स्थिति सिद्ध मध्यम ज्ञानीकी कही गयी है। अब साधककी बतलाता हूँ, सुनो। साधक जैसे-जैसे आत्मानुसन्धानमें तत्पर रहता है वैसे-वैसे उसे स्वरूपकी स्मृति बढ़ती जाती है। पूर्ण होनेपर तो स्वरूपकी विस्मृति होती ही नहीं और मिथ्या द्वैतका स्फुरण भी प्रयत्न करनेपर ही होता है ॥ ५१-५२ पू० ॥ ब्रह्मन् ! उत्तम ज्ञानीकी दृष्टिमें तो समाधि और व्यवहारका लेशमात्र भी भेद नहीं होता, क्योंकि उसे स्वरूपकी स्मृति सदा ही बनी रहती है ॥ ५२ उ०-५३ पू० ॥ जो समाधिनिष्ठ मध्यम ज्ञानी होता है उसे जो स्वरूपकी अविस्मृति रहती है, हे ब्राह्मण ! वह तो मिथ्या अज्ञानकी स्थिति आनेपर कुछ मन्द पड़ जाती है। किन्तु जो उत्तम ज्ञानी है वह
३५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे समाध्यतत्परो भूयात्तस्याम्लानैव चास्मृतिः । वस्तुतः शृणु भूदेव मध्यमोत्तमज्ञानिनाम् ॥ ५५ ॥ कर्म नैवास्ति यत्किञ्चिद्यतस्ते पूर्णतां गताः । संविदात्मातिरिक्तं यन्न ते पश्यन्ति किञ्चन ॥ ५६ ॥ कर्म शेषं कथं शिष्येद्यतः सर्वं चिदग्निना । भस्मीकृतमतस्तेषां न किञ्चित् परिशिष्यते ॥ ५७ ॥ ऐन्द्रजालिककर्मेव त्वितरैरेव दृश्यते । शृणु ब्रह्मन् रहस्यं ते प्रवक्ष्यामि समासतः ॥ ५८ ॥ शिवस्य यादृशी सैव ज्ञानिनां दृष्टिरुच्यते । नास्ति भेदो लेशतोऽपि सत्यमेतन्न संशयः ॥ ५९ ॥ तस्मान्न किञ्चित् कर्मापि ज्ञानिनामनुवर्त्तते । इति श्रुत्वा स वसुमान् हेमाङ्गदनिरूपितम् ॥ ६० ॥ सर्वसन्देहनिर्मुक्तो विज्ञानविशदाशयः । स्वेच्छासे अथवा प्रारब्धाधीन होनेपर भी यदि समाधिमें तत्पर न रहे तो भी उसकी स्वरूपकी अविस्मृति मन्द नहीं पड़ती ॥ ५३ उ०-५५ पू० ॥ विप्रवर ! सुनो, वास्तवमें तो मध्यम और उत्तम ज्ञानियोंके कुछ भी कर्म हैं ही नहीं, क्योंकि वे तो पूर्णताको प्राप्त हो जाते हैं । एक चिदात्माके सिवा वे और कोई वस्तु नहीं देखते ॥ ५५ उ०-५६ ॥ उनके किसी प्रकारके अवशिष्ट कर्म कैसे रह सकते हैं, क्योंकि वे सब तो चेतनरूप अग्निसे भस्म हो गये हैं । अतः उनके कोई भी कर्म शेष नहीं रहते ॥ ५७ ॥ मायावीके खेलके समान उनके कर्म तो दूसरोंको ही दिखाई देते हैं । ब्रह्मन् ! सुनो, इसमें जो गूढ़ रहस्य है वह मैं संक्षेपमें कहता हूँ ॥ ५८ ॥ जैसी दृष्टि शिवजीकी है वैसी ही ज्ञानियोंकी दृष्टि बतलायी जाती है । उनमें लेशमात्र भी अन्तर नहीं है—यह बात निः- सन्देह सत्य है । इसलिये वास्तवमें ज्ञानियोंका कुछ भी कर्म शेष नहीं रहता ॥ ५६-६० पू० ॥ इस प्रकार हेमाङ्गदका तत्त्वनिरूपण सुनकर वसुमान् सब सन्देहों-
द्वाविंशोऽध्यायः । ३५६ पूजितो राजपुत्राद्यैः संस्थानं प्रत्यपद्यत ॥ ६१ ॥ प्राप्तौ स्वनगरं राजपुत्रावपि ततः परम् । एवं श्रुत्वा पुनारामः पप्रच्छात्रिसुतं मुनिम् ॥ ६२ ॥ श्रुतमेतद्धि विज्ञानं गुरो त्वन्मुखनिर्गतम् । विनष्टो मम सन्देहो विदितं तन्महत् पदम् ॥ ६३ ॥ सर्वानुस्यूतसंवित्तिमात्रात्मा भाति सर्वतः । तथापि भवता प्रोक्तमादितः सर्वमेव तु ॥ ६४ ॥ संक्षेपेण पुनर्ब्रूहि विज्ञानं सारवत्तरम् । यावद्धारयितव्यं मे गुरो सर्वात्मना मया ॥ ६५ ॥ इत्यापृष्टः स रामेण पुनः प्राहात्रिनन्दनः । शृणु राम प्रवक्ष्यामि सर्वसारतमं पुनः ॥ ६६ ॥ या चितिः परमेशानी पूर्णाहन्तामयी परा । सा स्वातन्त्र्याभिधामायाशक्तिमाहात्म्यतः सदा ॥ ६७ ॥ से मुक्त हो गया तथा उसका अन्तःकरण विज्ञानके प्रकाशसे उज्ज्वल हो गया। फिर राजपुत्रादिसे सम्मानित हो वह अपने स्थानको चला गया ॥ ६० उ०-६१ ॥ इसके पश्चात् वे दोनों राजकुमार भी अपनी राजधानीमें चले आये। यह सब सुनकर परशुरामने पुनः मुनिवर दत्तात्रेयसे पूछा—॥ ६२ ॥ “गुरुदेव ! आपके मुखारविन्दसे निःसृत यह ज्ञानोपदेश मैंने सुना। इससे मेरा सन्देह जाता रहा और मुझे उस परमपदका ज्ञान भी हो गया ॥ ६३ ॥ सबमें ओतप्रोत चिन्मात्र आत्मा ही सब ओर भास रहा है। तथापि गुरुदेव ! आपने आरम्भसे अबतक जो कुछ कहा है उसे एक बार संक्षेपसे, जो सबका सारभूत विज्ञान हो और जितना मुझे सभी प्रकार ध्यानमें रखना चाहिये, पुनः सुनाइये” ॥ ६४-६५ ॥ परशुरामके इस प्रकार पूछनेपर अत्रिनन्दन श्रीदत्तात्रेयजी पुनः कहने लगे, “परशुराम ! सुनो, अब जो सबका अत्यन्त सार है वह तुम्हें फिर सुनाता हूँ ॥ ६६ ॥ जो परम समर्था और पूर्णाहन्तामयी परा चिति है वह अपनी स्वतन्त्रतारूपा मायाशक्तिकी महिमासे, जो असम्भवको भी सम्भव
३६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे जगदाभासयेन्नूनं दुर्घटैकविधायिनः । प्रतिबिम्बवदादर्शे तत्प्रकारं शृणु क्रमात् ॥ ६८ ॥ या सा पराचितिः पूर्णा पूर्णाहंभावबृंहिता । स्वातन्त्र्यवशतः स्वात्मरूपं द्वेधावभासयत् ॥ ६९ ॥ तत्रैकांशेऽप्यहंभावो पूर्ण आभासितो यदा । तदा द्वितीयभागस्तदहंभावविनिर्गतः ॥ ७० ॥ बाह्यमव्यक्तमभवत्तद्दृष्ट्यैव भृगूद्वह । अपूर्णाहंभावयुत एष प्रोक्तः सदाशिवः ॥ ७१ ॥ स तमव्यक्तभागन्तु पश्यन् भिन्नमपि स्वतः । अहमेतदित्यभेदादनुसन्दधिपरः सदा ॥ ७२ ॥ स एव भूयः स्वातन्त्र्यात् सिसृक्षुर्विविधं जगत् । अव्यक्तमात्मनो देहमेतदेवाहमस्थितः ॥ ७३ ॥ कर देनेवाली है, दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अपने हीमें इस जगत्को आभासित कर देती है। उसके जगत्-प्रकाशनका प्रकार क्रमशः सुनो ॥ ६७-६८ ॥ वह जो परिपूर्ण पराचिति है पूर्ण अहम्भावके कारण अत्यन्त विस्तृत है। अपने स्वातन्त्र्यके प्रभावसे उसने अपने ही स्वरूपको दो रूपोंमें आभासित किया ॥ ६९ ॥ जब उसके एक अंशमें अपूर्ण अहन्ता आभासित हुई तो दूसरा भाग उस अहन्तासे शून्य बाह्य (जड) अव्यक्त हो गया। भृगु- नन्दन ! उस बाह्य अव्यक्तकी दृष्टिसे ही वह अपूर्ण अहन्तायुक्त अंश 'सदाशिव' कहा जाता है ॥ ७०-७१ ॥ वह यद्यपि उस अव्यक्त अंशको अपनेसे भिन्न ही देखता है तथापि उसे सर्वथा अभेदपूर्वक यही जान पड़ता है कि यह मैं ही हूँ ॥ ७२ ॥ उसीको स्वतन्त्रताके कारण फिर अनेक प्रकारका जगत् रचने- की इच्छा हो जाती है और वह अव्यक्तरूप अपनी देहमें 'मैं यही हूँ' ऐसी आस्था करने लगता है ॥ ७३ ॥
द्वाविंशोऽध्यायः । ३६१ इत्येवमनुसन्धानपर ईश्वर आबभौ । अव्यक्तमभिमानेनाविष्ट ईश्वर एव तु ॥ ७४ ॥ त्रिधासमभवद्रुद्रहरिद्रुहिणरूपतः । द्रष्टृदृश्यमहाराशिसमुदायावभासकः ॥ ७५ ॥ विधयो विविधा आसंस्तथा तद्रूपसंस्थिताः । बहवो हरयोऽप्यासंस्तत्संहारपरायणाः ॥ ७६ ॥ अनेकशोऽभवन् रुद्रा एवमेष जगद्विधिः । एवंविधं जगत्तत्त्वं दर्पणप्रतिविम्बवत् ॥ ७७ ॥ भासते केवलं राम न हि जातं तु किञ्चन । पराचितिः प्रपूर्णांहंभावरूपैव सर्वदा ॥ ७८ ॥ स्थिताप्यनेका सम्पूर्णांहंभावपरिवृंहिता । यथा त्वं राम सर्वस्मिन् देहेऽहंभावबृंहितः ॥ ७९ ॥ पृथङ् नेत्राद्यहंभावैरपि तत्तत्क्रियापरः । इस प्रकारका अनुसन्धान करने लगनेपर वह 'ईश्वर' हो गया । जो अभिमान द्वारा अव्यक्तमें आविष्ट है वही 'ईश्वर' है ॥ ७४ ॥ इस दृश्यवर्गके महान् राशिरूप समुदायका अवभासक वह द्रष्टा ही रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा रूपसे तीन प्रकारका हो गया ॥ ७५ ॥ इस ब्रह्माण्डकी स्थिति ( उत्पत्ति ) करनेवाले ब्रह्मा अनेकों थे, विष्णु भी अनेक थे तथा इस जगत्का संहार करनेवाले रुद्र भी अनेकों थे । ऐसा ही इस जगत्का विधान है ॥ ७६-७७ पू० ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान इस संसारका स्वरूप ऐसा ही है । परशुराम ! यह केवल भासता ही है, वास्तवमें है कुछ नहीं ॥ ७७ उ०-७८ पू० ॥ परिपूर्णरूपा पराचिति सर्वदा अहंभावरूपा ही है। वह स्थिर- स्वरूपा होनेपर भी सम्पूर्ण अहंभावोंसे विस्तृत हुई-सी जान पड़ती है, जिस प्रकार कि परशुराम ! तुम इस देहमें अहंभावसे व्याप्त हो, तथापि नेत्रादि विभिन्न अहंभावोंके द्वारा भी उन अनेक व्यापारोंमें लगे रहते हो ॥ ७८ उ०-८० पू० ॥
३६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवमेव परा संवित् पूर्णाहन्तासमाश्रया ॥ ८० ॥ सदाशिवादिस्तंबान्ताऽपूर्णाहन्ताश्रयापि वै । वस्तुतः सैव परमा चितिरेवं हि भासिनी ॥ ८१ ॥ देहाहंभावरूपस्त्वं स्वतो रूपरसादिकम् । ग्रहीतुमसमर्थोऽपि चाक्षतादात्म्यमेत्य तु ॥ ८२ ॥ सर्वं गृह्णासि सततमेवं देवः सदाशिवः । स्वतः सर्वाभेदमयो ब्रह्मादिस्तम्बराशिषु ॥ ८३ ॥ अतस्तादात्म्यमापन्नो जानाति च करोति च । यथा ते निर्विकल्पं तु रूपं सर्वाश्रयं हि सत् ॥ ८४ ॥ न किञ्चिदपि जानाति करोति च भृगूद्वह । एवमेव परा संवित् सर्वलोकसमाश्रया ॥ ८५ ॥ भेदलेशमपि क्वापि न जानाति करोति च । एतावज्जगतं सर्वं तस्यामेवावभासते ॥ ८६ ॥ इसी प्रकार यह परा चिति भी पूर्ण अहन्ताकी आश्रय है, तथापि यह सदाशिवसे लेकर स्तम्बपर्यन्त अपूर्ण अहंभावोंकी भी आश्रय है। वास्तवमें तो वह पराचिति ही इस प्रकार (इन सब रूपोंमें) भासनेवाली है ॥ ८० उ०-८१ ॥ तुम देहमें अहंभावरूप होकर यद्यपि स्वयं रूप-रस आदि विषयों- को ग्रहण करनेमें असमर्थ हो, तथापि इन्द्रियोंसे तादात्म्य करके तो सर्वदा सब कुछ ग्रहण करते ही हो। इसी प्रकार भगवान् सदाशिव यद्यपि ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब पर्यन्त सबके साथ अभिन्नरूप ही हैं, तथापि उन ब्रह्मादिके शरीरोंमें तादात्म्य होनेपर वे ही सब कुछ जानते भी हैं और करते भी हैं ॥ ८२-८४ पू० ॥ जिस प्रकार तुम्हारा निर्विकल्प स्वरूप सबका आश्रय और सत् है, किन्तु भृगुनन्दन ! वह न तो कुछ जानता है और न कुछ करता है; इसी प्रकार वह परा चिति यद्यपि सम्पूर्ण लोकोंकी आश्रय है, तथापि वह लेशमात्र द्वैतको भी न तो जानती है और न कुछ करती ही है ॥ ८४ उ०-८६ पू० ॥ यह सारा जगत्प्रपञ्च उसीमें भास रहा है, किन्तु अपनी स्वतन्त्रता-
द्वाविंशोऽध्यायः । ३६३ तत्स्वातन्त्र्यात् प्रभूतश्च दर्पणप्रतिबिम्बवत् । जगतो भासनं सर्वं तस्या एवावभासनम् ॥ ८७ ॥ यथादर्शाभास एष प्रतिबिम्बावभासनम् । अत्र त्वमहमन्वे च द्रष्टारो दृङ्मयाः खलु ॥ ८८ ॥ दृश्यासंमेलने शुद्धचितिरेव न चेतरत् । घटादिदर्पणो यद्वद् घटादीनामसङ्गमे ॥ ८९ ॥ शुद्धदर्पणमात्रः स्याद्विभेदः प्रतिबिम्बतः । एवं विकल्पसम्भूतदृश्याभासप्रमार्जने ॥ ९० ॥ शेषिता परमा संविदद्वितीयास्वरूपिणी । महानन्दघना चैषा दुःखलेशविवर्जनात् ॥ ९१ ॥ सर्वानन्दघनाकारा यतः सर्वैरभीप्सिता । सुखमात्मस्वरूपं स्यात् सर्वैर्यस्मादभीप्सितम् ॥ ९२ ॥ रूपा शक्तिसे वही दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अनेकरूप हो गयी है। अतः यह जगत्का सारा अवभास वास्तवमें उसीका आभास है, जिस प्रकार कि प्रतिबिम्बकी प्रतीति केवल दर्पणका ही आभास होती है ॥ ८६ उ०-८८ पू० ॥ यहाँ जो मैं तथा अन्य देखनेवाले हैं वे निश्चय चिन्मात्र ही हैं। यदि उनके साथ दृश्यकी मिलावट न हो तो वे शुद्धचिति ही हैं, और कुछ नहीं ॥ ८८ उ०-८६ पू० ॥ जिस प्रकार घटादिके प्रतिबिम्बोंसे अवच्छिन्न दर्पण घटादिका संग न रहनेपर शुद्ध दर्पणमात्र ही होता है। उसमें जो भेद है वह तो प्रतिबिम्बके कारण ही है ॥ ८६ उ०-६० पू० ॥ इसी प्रकार विकल्पसे उत्पन्न दृश्यरूप आभासका मार्जन (निषेध) करनेपर बची हुई परा चिति तो अद्वयस्वरूपा ही है। वह दुःखके लेशसे शून्य है, इसलिये परमानन्दघनरूपा भी है ॥ ६० उ०-६१ ॥ यह सम्पूर्ण आनन्दोंकी घनीभूत मूर्ति है, क्योंकि उसे सभी चाहते हैं। सुख आत्माका स्वरूप ही है, क्यों सभीको उसकी लालसा है ॥ ६२ ॥