भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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द्वाविंशोऽध्यायः । ३६१ इत्येवमनुसन्धानपर ईश्वर आबभौ । अव्यक्तमभिमानेनाविष्ट ईश्वर एव तु ॥ ७४ ॥ त्रिधासमभवद्रुद्रहरिद्रुहिणरूपतः । द्रष्टृदृश्यमहाराशिसमुदायावभासकः ॥ ७५ ॥ विधयो विविधा आसंस्तथा तद्रूपसंस्थिताः । बहवो हरयोऽप्यासंस्तत्संहारपरायणाः ॥ ७६ ॥ अनेकशोऽभवन् रुद्रा एवमेष जगद्विधिः । एवंविधं जगत्तत्त्वं दर्पणप्रतिविम्बवत् ॥ ७७ ॥ भासते केवलं राम न हि जातं तु किञ्चन । पराचितिः प्रपूर्णांहंभावरूपैव सर्वदा ॥ ७८ ॥ स्थिताप्यनेका सम्पूर्णांहंभावपरिवृंहिता । यथा त्वं राम सर्वस्मिन् देहेऽहंभावबृंहितः ॥ ७९ ॥ पृथङ् नेत्राद्यहंभावैरपि तत्तत्क्रियापरः । इस प्रकारका अनुसन्धान करने लगनेपर वह 'ईश्वर' हो गया । जो अभिमान द्वारा अव्यक्तमें आविष्ट है वही 'ईश्वर' है ॥ ७४ ॥ इस दृश्यवर्गके महान् राशिरूप समुदायका अवभासक वह द्रष्टा ही रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा रूपसे तीन प्रकारका हो गया ॥ ७५ ॥ इस ब्रह्माण्डकी स्थिति ( उत्पत्ति ) करनेवाले ब्रह्मा अनेकों थे, विष्णु भी अनेक थे तथा इस जगत्का संहार करनेवाले रुद्र भी अनेकों थे । ऐसा ही इस जगत्का विधान है ॥ ७६-७७ पू० ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान इस संसारका स्वरूप ऐसा ही है । परशुराम ! यह केवल भासता ही है, वास्तवमें है कुछ नहीं ॥ ७७ उ०-७८ पू० ॥ परिपूर्णरूपा पराचिति सर्वदा अहंभावरूपा ही है। वह स्थिर- स्वरूपा होनेपर भी सम्पूर्ण अहंभावोंसे विस्तृत हुई-सी जान पड़ती है, जिस प्रकार कि परशुराम ! तुम इस देहमें अहंभावसे व्याप्त हो, तथापि नेत्रादि विभिन्न अहंभावोंके द्वारा भी उन अनेक व्यापारोंमें लगे रहते हो ॥ ७८ उ०-८० पू० ॥