त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवमेव परा संवित् पूर्णाहन्तासमाश्रया ॥ ८० ॥ सदाशिवादिस्तंबान्ताऽपूर्णाहन्ताश्रयापि वै । वस्तुतः सैव परमा चितिरेवं हि भासिनी ॥ ८१ ॥ देहाहंभावरूपस्त्वं स्वतो रूपरसादिकम् । ग्रहीतुमसमर्थोऽपि चाक्षतादात्म्यमेत्य तु ॥ ८२ ॥ सर्वं गृह्णासि सततमेवं देवः सदाशिवः । स्वतः सर्वाभेदमयो ब्रह्मादिस्तम्बराशिषु ॥ ८३ ॥ अतस्तादात्म्यमापन्नो जानाति च करोति च । यथा ते निर्विकल्पं तु रूपं सर्वाश्रयं हि सत् ॥ ८४ ॥ न किञ्चिदपि जानाति करोति च भृगूद्वह । एवमेव परा संवित् सर्वलोकसमाश्रया ॥ ८५ ॥ भेदलेशमपि क्वापि न जानाति करोति च । एतावज्जगतं सर्वं तस्यामेवावभासते ॥ ८६ ॥ इसी प्रकार यह परा चिति भी पूर्ण अहन्ताकी आश्रय है, तथापि यह सदाशिवसे लेकर स्तम्बपर्यन्त अपूर्ण अहंभावोंकी भी आश्रय है। वास्तवमें तो वह पराचिति ही इस प्रकार (इन सब रूपोंमें) भासनेवाली है ॥ ८० उ०-८१ ॥ तुम देहमें अहंभावरूप होकर यद्यपि स्वयं रूप-रस आदि विषयों- को ग्रहण करनेमें असमर्थ हो, तथापि इन्द्रियोंसे तादात्म्य करके तो सर्वदा सब कुछ ग्रहण करते ही हो। इसी प्रकार भगवान् सदाशिव यद्यपि ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब पर्यन्त सबके साथ अभिन्नरूप ही हैं, तथापि उन ब्रह्मादिके शरीरोंमें तादात्म्य होनेपर वे ही सब कुछ जानते भी हैं और करते भी हैं ॥ ८२-८४ पू० ॥ जिस प्रकार तुम्हारा निर्विकल्प स्वरूप सबका आश्रय और सत् है, किन्तु भृगुनन्दन ! वह न तो कुछ जानता है और न कुछ करता है; इसी प्रकार वह परा चिति यद्यपि सम्पूर्ण लोकोंकी आश्रय है, तथापि वह लेशमात्र द्वैतको भी न तो जानती है और न कुछ करती ही है ॥ ८४ उ०-८६ पू० ॥ यह सारा जगत्प्रपञ्च उसीमें भास रहा है, किन्तु अपनी स्वतन्त्रता-