भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

द्वाविंशोऽध्यायः । ३६३ तत्स्वातन्त्र्यात् प्रभूतश्च दर्पणप्रतिबिम्बवत् । जगतो भासनं सर्वं तस्या एवावभासनम् ॥ ८७ ॥ यथादर्शाभास एष प्रतिबिम्बावभासनम् । अत्र त्वमहमन्वे च द्रष्टारो दृङ्मयाः खलु ॥ ८८ ॥ दृश्यासंमेलने शुद्धचितिरेव न चेतरत् । घटादिदर्पणो यद्वद् घटादीनामसङ्गमे ॥ ८९ ॥ शुद्धदर्पणमात्रः स्याद्विभेदः प्रतिबिम्बतः । एवं विकल्पसम्भूतदृश्याभासप्रमार्जने ॥ ९० ॥ शेषिता परमा संविदद्वितीयास्वरूपिणी । महानन्दघना चैषा दुःखलेशविवर्जनात् ॥ ९१ ॥ सर्वानन्दघनाकारा यतः सर्वैरभीप्सिता । सुखमात्मस्वरूपं स्यात् सर्वैर्यस्मादभीप्सितम् ॥ ९२ ॥ रूपा शक्तिसे वही दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अनेकरूप हो गयी है। अतः यह जगत्का सारा अवभास वास्तवमें उसीका आभास है, जिस प्रकार कि प्रतिबिम्बकी प्रतीति केवल दर्पणका ही आभास होती है ॥ ८६ उ०-८८ पू० ॥ यहाँ जो मैं तथा अन्य देखनेवाले हैं वे निश्चय चिन्मात्र ही हैं। यदि उनके साथ दृश्यकी मिलावट न हो तो वे शुद्धचिति ही हैं, और कुछ नहीं ॥ ८८ उ०-८६ पू० ॥ जिस प्रकार घटादिके प्रतिबिम्बोंसे अवच्छिन्न दर्पण घटादिका संग न रहनेपर शुद्ध दर्पणमात्र ही होता है। उसमें जो भेद है वह तो प्रतिबिम्बके कारण ही है ॥ ८६ उ०-६० पू० ॥ इसी प्रकार विकल्पसे उत्पन्न दृश्यरूप आभासका मार्जन (निषेध) करनेपर बची हुई परा चिति तो अद्वयस्वरूपा ही है। वह दुःखके लेशसे शून्य है, इसलिये परमानन्दघनरूपा भी है ॥ ६० उ०-६१ ॥ यह सम्पूर्ण आनन्दोंकी घनीभूत मूर्ति है, क्योंकि उसे सभी चाहते हैं। सुख आत्माका स्वरूप ही है, क्यों सभीको उसकी लालसा है ॥ ६२ ॥