त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यदर्थो देहादिभावो यन्न कस्यापि नेप्सितम् । यस्यैव लेशो विषयानन्द इत्यभिधीयते ॥ ९३ ॥ स एव भारहानादौ सुषुप्तौ चावभासते । चिदेव स्पृहणीयत्वादानन्द इति प्रोच्यते । ९४ ॥ मूढा न हि विजानन्ति स्वात्मभूतं महासुखम् । विभिन्नमभिजानन्ति व्यञ्जकानां विभेदतः ॥ ९५ ॥ यथा हि दर्पणे भावा भासमाना निमित्ततः । यावद्दर्पणविज्ञानं भिन्ना एव विभान्ति वै ॥ ९६ ॥ विदिते प्रतिबिम्बत्वे भासमानं च पूर्ववत् । न दर्पणाद् भिन्नमस्ति त्वादर्शः शुद्ध एव हि ॥ ९७ ॥ एवं विदिततत्त्वस्य जगदेतावदीदृशम् । भासमानमपि स्वात्ममात्रमेव न चेतरत् ॥ ९८ ॥ घटादिकं मृदि यथा हेम्नि यद्वद्विभूषणम् । जिसके लिये देहादिमें प्रीति होती है, जो किसीको भी अप्रिय नहीं है और जिसका लेशमात्र अंश ही 'विषयानन्द' कहा जाता है, वह स्वरूपभूत आनन्द ही भार आदिकी निवृत्ति होनेपर तथा सुषुप्ति अवस्थामें भासता है। वास्तवमें तो वाञ्छनीय होनेके कारण चेतन ही 'आनन्द' कहा जाता है ॥ ९३-९४ ॥ अज्ञानी पुरुष अपने आत्मासे ही प्राप्त होनेवाले उस परम सुखको नहीं जानते; वे तो उसको व्यक्त करनेवाले विषयोंकी विभिन्नताके कारण अपनेसे भिन्न ही समझते हैं ॥ ९५ ॥ जिस प्रकार बिम्बरूप निमित्तोंके कारण दर्पणमें भासनेवाले पदार्थ, जबतक दर्पणका ज्ञान नहीं होता उससे भिन्न ही जान पड़ते हैं, किन्तु जब उनकी प्रतिबिम्बताका ज्ञान हो जाता है तो पहले हीकी तरह भासते रहनेपर भी वे दर्पणसे भिन्न नहीं रहते । और दर्पण तो शुद्ध है ही। उसी प्रकार जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है उसके लिये यह जगत् इसी रूप भासता रहनेपर भी अपना आत्मा ही है, और कुछ नहीं ॥ ९६-९८ ॥ जैसे मृत्तिकामें घटादि, सुवर्णमें आभूषण और शिलामें प्रति-