भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

द्वाविंशोऽध्यायः । ३६५ प्रतिभाश्च यथा शैले जगदेवं चिदात्मनि ॥ ९९ ॥ जगन्नास्त्येवेति दृष्टिरपूर्णैव भृगूद्वह । नास्तीति विपरीतो हि निश्चयो नैव सिद्ध्यति ॥ १०० ॥ साधकात्मजगद्दृष्टेर्भूयः सम्भवतः स्फुटम् । नास्तीति शापमात्रेण कथं स्याज्जगतो लयः ॥ १०१ ॥ आदर्शनगरं सर्वमस्त्यादर्शस्वभावतः । एवं जगच्चिदात्मैकरूपं सत्यमुदीरितम् ॥ १०२ ॥ पूर्णविज्ञानमेतत् स्यात् सङ्कोचपरिवर्जनात् । दृगेव दृश्यतां प्राप्तं स्वमाहात्म्यप्रकर्षतः ॥ १०३ ॥ यथादर्शो नगरतामेष शास्त्रार्थसंग्रहः । न बन्धोऽस्ति न मोक्षोऽस्ति साधकः साधनं च न ॥ १०४ ॥ माओंकी प्रतीति होती है उसी प्रकार चिदात्मामें यह जगत् भास रहा है ॥ ९९ ॥ परशुराम ! 'जगत् है ही नहीं' यह दृष्टि तो अपूर्ण ही है, क्योंकि 'है ही नहीं' ऐसा विपरीत निश्चय किसी प्रमाणसे सिद्ध नहीं होता ॥ १०० ॥ [ 'सम्पूर्ण द्वैतका निषेध कर देनेपर 'है' और 'नहीं है' इन दोनों ही पक्षोंको ] सिद्ध करनेवाले चिदात्मस्वरूपसे फिर भी जगत्की सत्ता स्पष्टतया रह ही जाती है । ऐसी अवस्थामें 'संसार है ही नहीं' ऐसा शाप देनेसे ही भला जगत्का लय कैसे हो सकता है ? ॥ १०१ ॥ जिस प्रकार दर्पणमें प्रतीत होनेवाला नगर दर्पणरूपसे तो है ही, उसी प्रकार जगत् अद्वितीय चिदात्मस्वरूपसे तो सत्य ही कहा गया है ॥ १०२ ॥ यही पूर्ण विज्ञान है, क्योंकि इसमें किसी प्रकारका सङ्कोच ( कमी ) नहीं है । वास्तवमें अपने स्वातन्त्र्यके प्रभावसे दृक् ( शुद्ध चेतन ) ही दृश्यरूप हो गया है; जैसे कि दर्पण ही अपनेमें प्रति- बिम्बित नगररूप हो जाता है—यही संक्षेपमें शास्त्रोंका तात्पर्य है ॥ १०३-१०४ पू० ॥ न बन्ध है, न मोक्ष है, न साधक है और न साधन है । एक