भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 404 में से

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३६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अखण्डाद्वयचिच्छक्तिस्त्रिपुरैवावभासिनी । सैवाविद्या च विद्या च बन्धो मोक्षश्च साधनम् ॥ १०५ ॥ एतावदेव विज्ञेयं नान्यद्‌भार्गव विद्यते । एतत्तेऽभिहितं राम विज्ञानक्रममादितः ॥ १०६ ॥ एतत् सुविज्ञाय जनो भूयः क्वापि न शोचति । नारदैष ज्ञानखण्डः सूपपत्त्युपलब्धिकः ॥ १०७ ॥ श्रुतो न नाशयेत् कस्य मोहमज्ञानसम्भवम् । श्रुत्वाप्येतद्यस्य मोहो न शान्तिं प्राप्नुयात् क्वचित् ॥ १०८ ॥ स शैलपुरुषो लोके केन ज्ञानं पुनर्भवेत् । सकृदेव श्रुतं ह्येतद्विज्ञानं जनयेद् दृढम् ॥ १०९ ॥ द्विधा त्रिधा वा मन्दस्य ज्ञानं न जनयेत् कथम् । एतत् पापौघशमनं श्रुतं विज्ञानदं मतम् ॥ ११० ॥ अखण्ड अद्वयस्वरूपा चित्-शक्ति ही प्रकाशित हो रही है। वही अविद्या और विद्या है तथा वही बन्ध, मोक्ष और साधन भी है ॥ १०४ उ०-१०५ ॥ भृगुनन्दन ! बस, इतनी बात ही जानने योग्य है, और कुछ नहीं। परशुराम ! इस प्रकार आरम्भसे ही यह मैंने तुम्हें ज्ञानप्राप्तिका क्रम सुना दिया। इसे अच्छी तरहसे समझ लेनेपर पुरुषको फिर किसी प्रकारका शोक नहीं होता ॥ १०६-१०७ पू० ॥ [श्रीहारितायन मुनि कहते हैं—] नारद ! यह ज्ञानखण्ड सम्यक् प्रकारसे युक्ति और अनुभवसे पूर्ण है। यदि इसका श्रवण किया जाय तो ऐसा कौन है जिसके अज्ञानजनित मोहको यह दूर न करे ॥ १०७ उ०-१०८ पू० ॥ इसे सुनकर भी जिसका मोह शान्त न हो वह तो इस लोकमें पत्थरकी मूर्ति ही है, उसे फिर और किसके द्वारा ज्ञान होगा ? ॥ १०८ उ०-१०९ पू० ॥ यह तो एक बार श्रवण करनेपर ही दृढ ज्ञान उत्पन्न कर देता है। फिर जो मन्दबुद्धि है उसे भी दो-तीन बार सुननेपर कैसे ज्ञान उत्पन्न नहीं करेगा ? ॥ १०९ उ०-११० पू० ॥ यह ग्रन्थ श्रवण करनेपर पापराशिको शान्त करनेवाला और विशुद्ध

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