त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः । ३६७ लिखितं दृष्टिदोषघ्नं पूजितं चित्तशोधनम् । मूढतानाशनं चैतत् सर्वदा परिशीलितम् ॥ १११ ॥ सर्वात्मभूतं यद्रूपं विचार्यावगतं स्फुटम् । मुक्तिः स्यादन्यथा बन्धः सा भवेत्त्रिपुरैव हीम् ॥ ११२ ॥ इति श्रीमदितिहासोत्तमे त्रिपुरारहस्ये द्वादशसाहस्र्यां संहितायां ज्ञानखण्डे द्वाविंशोऽध्यायः । ज्ञान प्रदान करनेवाला माना गया है। इसे लिखा जाय तो यह दृष्टि- के दोषोंको दूर करता है, पूजा जाय तो चित्त शुद्ध करता और यदि सर्वदा विचारा जाय तो यह मूढता ( अज्ञान ) को नष्ट करनेवाला है ॥ ११० उ०-१११ ॥ जो सबका आत्मभूत स्वरूप है उसे यदि विचार करके स्पष्टतया जान लिया जाय तो मुक्ति हो जाती है, नहीं तो बन्ध है ही। वह स्वरूप देवी त्रिपुरा ही है ॥ ११२ ॥ ह्रीम् । ॐ तत्सत् । द्वाविंश अध्याय समाप्त ।