त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 374, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे जगदाभासयेन्नूनं दुर्घटैकविधायिनः । प्रतिबिम्बवदादर्शे तत्प्रकारं शृणु क्रमात् ॥ ६८ ॥ या सा पराचितिः पूर्णा पूर्णाहंभावबृंहिता । स्वातन्त्र्यवशतः स्वात्मरूपं द्वेधावभासयत् ॥ ६९ ॥ तत्रैकांशेऽप्यहंभावो पूर्ण आभासितो यदा । तदा द्वितीयभागस्तदहंभावविनिर्गतः ॥ ७० ॥ बाह्यमव्यक्तमभवत्तद्दृष्ट्यैव भृगूद्वह । अपूर्णाहंभावयुत एष प्रोक्तः सदाशिवः ॥ ७१ ॥ स तमव्यक्तभागन्तु पश्यन् भिन्नमपि स्वतः । अहमेतदित्यभेदादनुसन्दधिपरः सदा ॥ ७२ ॥ स एव भूयः स्वातन्त्र्यात् सिसृक्षुर्विविधं जगत् । अव्यक्तमात्मनो देहमेतदेवाहमस्थितः ॥ ७३ ॥ कर देनेवाली है, दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अपने हीमें इस जगत्को आभासित कर देती है। उसके जगत्-प्रकाशनका प्रकार क्रमशः सुनो ॥ ६७-६८ ॥ वह जो परिपूर्ण पराचिति है पूर्ण अहम्भावके कारण अत्यन्त विस्तृत है। अपने स्वातन्त्र्यके प्रभावसे उसने अपने ही स्वरूपको दो रूपोंमें आभासित किया ॥ ६९ ॥ जब उसके एक अंशमें अपूर्ण अहन्ता आभासित हुई तो दूसरा भाग उस अहन्तासे शून्य बाह्य (जड) अव्यक्त हो गया। भृगु- नन्दन ! उस बाह्य अव्यक्तकी दृष्टिसे ही वह अपूर्ण अहन्तायुक्त अंश 'सदाशिव' कहा जाता है ॥ ७०-७१ ॥ वह यद्यपि उस अव्यक्त अंशको अपनेसे भिन्न ही देखता है तथापि उसे सर्वथा अभेदपूर्वक यही जान पड़ता है कि यह मैं ही हूँ ॥ ७२ ॥ उसीको स्वतन्त्रताके कारण फिर अनेक प्रकारका जगत् रचने- की इच्छा हो जाती है और वह अव्यक्तरूप अपनी देहमें 'मैं यही हूँ' ऐसी आस्था करने लगता है ॥ ७३ ॥