त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः । ३५६ पूजितो राजपुत्राद्यैः संस्थानं प्रत्यपद्यत ॥ ६१ ॥ प्राप्तौ स्वनगरं राजपुत्रावपि ततः परम् । एवं श्रुत्वा पुनारामः पप्रच्छात्रिसुतं मुनिम् ॥ ६२ ॥ श्रुतमेतद्धि विज्ञानं गुरो त्वन्मुखनिर्गतम् । विनष्टो मम सन्देहो विदितं तन्महत् पदम् ॥ ६३ ॥ सर्वानुस्यूतसंवित्तिमात्रात्मा भाति सर्वतः । तथापि भवता प्रोक्तमादितः सर्वमेव तु ॥ ६४ ॥ संक्षेपेण पुनर्ब्रूहि विज्ञानं सारवत्तरम् । यावद्धारयितव्यं मे गुरो सर्वात्मना मया ॥ ६५ ॥ इत्यापृष्टः स रामेण पुनः प्राहात्रिनन्दनः । शृणु राम प्रवक्ष्यामि सर्वसारतमं पुनः ॥ ६६ ॥ या चितिः परमेशानी पूर्णाहन्तामयी परा । सा स्वातन्त्र्याभिधामायाशक्तिमाहात्म्यतः सदा ॥ ६७ ॥ से मुक्त हो गया तथा उसका अन्तःकरण विज्ञानके प्रकाशसे उज्ज्वल हो गया। फिर राजपुत्रादिसे सम्मानित हो वह अपने स्थानको चला गया ॥ ६० उ०-६१ ॥ इसके पश्चात् वे दोनों राजकुमार भी अपनी राजधानीमें चले आये। यह सब सुनकर परशुरामने पुनः मुनिवर दत्तात्रेयसे पूछा—॥ ६२ ॥ “गुरुदेव ! आपके मुखारविन्दसे निःसृत यह ज्ञानोपदेश मैंने सुना। इससे मेरा सन्देह जाता रहा और मुझे उस परमपदका ज्ञान भी हो गया ॥ ६३ ॥ सबमें ओतप्रोत चिन्मात्र आत्मा ही सब ओर भास रहा है। तथापि गुरुदेव ! आपने आरम्भसे अबतक जो कुछ कहा है उसे एक बार संक्षेपसे, जो सबका सारभूत विज्ञान हो और जितना मुझे सभी प्रकार ध्यानमें रखना चाहिये, पुनः सुनाइये” ॥ ६४-६५ ॥ परशुरामके इस प्रकार पूछनेपर अत्रिनन्दन श्रीदत्तात्रेयजी पुनः कहने लगे, “परशुराम ! सुनो, अब जो सबका अत्यन्त सार है वह तुम्हें फिर सुनाता हूँ ॥ ६६ ॥ जो परम समर्था और पूर्णाहन्तामयी परा चिति है वह अपनी स्वतन्त्रतारूपा मायाशक्तिकी महिमासे, जो असम्भवको भी सम्भव