त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तावतैव तु तज्ज्ञानं न भ्रान्तिरभिधीयते ॥ १८ ॥ अतत्त्वज्ञे हि सा भ्रान्तिस्तत्त्वज्ञे सा प्रमैव हि । हतप्रामाण्यजीवं तज्ज्ञानं मृतमहाहिवत् ॥ १९ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बस्य व्यवहारसमो भवेत् । अभिज्ञस्यानभिज्ञस्य चाप्यतोऽस्ति भिदा तयोः ॥ २० ॥ ज्ञस्य प्रमैव तज्ज्ञानमज्ञस्य तु भ्रमात्मकम् । ज्ञानिनां ज्ञानमेव स्यात् सर्वोऽपि व्यवहारकः ॥ २१ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बानां व्यवहारेण सम्मितः । अभिज्ञानामतो भूयो न हि भ्रान्तेः समुद्भवः ॥ २२ ॥ केवलाज्ञानजनितं ज्ञानेन विनिवर्त्तते । दोषेण जनितं कस्माद्विलीयेज्ज्ञानमात्रतः ॥ २३ ॥ है,' ऐसा बोलकर कभी व्यवहार भी करते ही हैं। किन्तु इतनेसे ही उनका वह ज्ञान भ्रान्ति तो नहीं कहा जाता ॥ १७-१८ ॥ अज्ञानीमें तो आकाशकी नीलिमाका ज्ञान भ्रान्ति ही है, किन्तु तत्त्वज्ञमें तो वह प्रमा ही है। उनका वह ज्ञान प्रामाण्यरूप जीवनसे रहित होनेके कारण मरे हुए सर्पके समान किसी अनर्थका कारण नहीं होता ॥ १९ ॥ ज्ञानियोंका व्यवहार दर्पणके प्रतिबिम्बकी हलचलके समान होता है। अतः ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनोंके व्यवहारमें भेद तो है ही ॥ २० ॥ वह व्यवहारसम्बन्धी ज्ञान ज्ञानीकी तो प्रमा है और अज्ञानीका भ्रम है। ज्ञानियोंके लिये तो सारा व्यवहार भी ज्ञानस्वरूप ही है ॥ २१ ॥ उनके लिये वह दर्पणमें भासनेवाले प्रतिबिम्बोंके व्यवहारके समान होता है । इसलिये ज्ञानियोंको पुनः भ्रान्ति की उत्पत्ति नहीं हो सकती ॥ २२ ॥ ज्ञानसे तो उसीकी निवृत्ति होती है जो केवल अज्ञानसे उत्पन्न हुआ हो। किन्तु जिसकी उत्पत्ति किसी अन्य दोषके कारण हुई हो वह केवल ज्ञानसे कैसे लीन हो सकता है ? ॥ २३ ॥