त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः । ३५१ ज्ञानं तदेव हि भवेद् यत्रेदं भासते जगत् । सङ्कल्पाद् व्यवहारो हि ज्ञाने सर्वं प्रकाशते ॥ १२ ॥ असङ्कल्पेन तद्रूपमनुलक्ष्य धिया सकृत् । कृतार्थो बन्धनिर्मुक्तो भवतीति सुनिश्चयः ॥ १३ ॥ तस्माद् ब्रह्मन् ते प्रश्नः सम्मतोऽयं सुबुद्धिभिः । पुनस्तं प्राह वसुमान् नृपसूनुं महाशयम् ॥ १४ ॥ सत्यं राजकुमारैतन्मयापीत्थं सुनिश्चितम् । स्वरूपं निर्विकल्पं हि संवेदनमिहोच्यते ॥ १५ ॥ सविकल्पत्वमापन्ने पुनर्भ्रान्तिः कुतो न हि । विकल्प एव हि भ्रान्तिर्यथा रज्जौ भुजङ्गमः ॥ १६ ॥ शृणु ब्रह्मन् न जानासि भ्रमाभ्रमविनिर्णयम् । गगने नीलिमा भाति गगनं जानतामपि ॥ १७ ॥ व्यवहारं च कुर्वन्ति नीलं नभ इति क्वचित् । जिसमें यह जगत् भास रहा है वही तो ज्ञान है । केवल संकल्पके द्वारा ज्ञानमें ही तो सारे व्यवहारका भास होता है ॥ १२ ॥ हाँ, यह बात बिलकुल निश्चित है कि निःसंकल्प हो जानेसे बुद्धिके द्वारा एक बार उस आत्मस्वरूपको लख लेनेपर जीव बन्धनसे मुक्त होकर कृतार्थ हो जाता है ॥ १३ ॥ इसलिये ब्रह्मन् ! आपका यह प्रश्न श्रेष्ठ बुद्धिवालोंको मान्य नहीं है ।” तब वसुमान्ने उस उदारचित्त राजकुमारसे पुनः कहा—॥ १४ ॥ “राजकुमार ! यह बात ठीक है और मैंने भी ऐसा ही निश्चय किया है । वास्तवमें अपना निर्विकल्प स्वरूप ही शुद्धचिति कहा गया है ॥ १५ ॥ किन्तु यदि वह विकल्पयुक्त हो जाय तो पुनः भ्रान्ति क्यों नहीं होगी ? क्योंकि जैसे रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है वैसे विकल्प ही तो भ्रान्ति है” ॥ १६ ॥ [ राजपुत्र— ] “ब्रह्मन् ! सुनो, आप तो भ्रम और भ्रमहीनताका निर्णय करना भी नहीं जानते । जो लोग आकाशको जानते हैं उन्हें भी उसमें नीलिमा तो दिखायी देती ही है । और वे ‘आकाश नीला