त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः । ३५३ अत एव तैमिरिकः पश्येज्जानन्नपि द्वयम् । जगदाभास एषस्तु कर्मदोषसमुद्भवः ॥ २४ ॥ तस्मादाकर्मविलयं व्यवहारो न लीयते । समाप्ते कर्मणि ततः शिष्येदद्वयचिन्मयम् ॥ २५ ॥ तस्मान्नास्त्येव विज्ञानं कदापि भ्रान्तिसम्भवः । इति श्रुत्वा पुनर्विप्रः पप्रच्छ नृपनन्दनम् ॥ २६ ॥ अहो नृपात्मज कथं ज्ञानिनां कर्म सम्भवेत् । ज्ञानाग्निसंस्पर्शनेऽपि कर्मतूलः कथं स्थितः ॥ २७ ॥ अथाह हेमाङ्गदोऽपि विप्रं तं नृपनन्दन । ब्रह्मन् शृणु प्रवक्ष्यामि त्रिविधं कर्म ज्ञानिनाम् ॥ २८ ॥ सर्वेषाञ्च समानं स्यादपक्वं पक्वमेव च । हतोदितं चेति तत्र नश्येज्ज्ञानादमध्यमम् ॥ २९ ॥ कर्मणा पाचकः कालो नियत्या नियतः स्थितः । यही कारण है कि तिमिर रोगवाला व्यक्ति यह जानते हुए भी कि पदार्थ एक है उसे दो रूपमें देखता है। यह जगत्की प्रतीति तो प्रारब्ध कर्मरूप दोषसे उत्पन्न हुई है। इसलिये जबतक प्रारब्धक्षय नहीं होता तबतक व्यवहारका भी लय नहीं होता। प्रारब्धकर्म समाप्त होनेपर तो केवल अद्वय चिन्मात्र तत्त्व ही रह जाता है ॥ २४-२५ ॥ इसलिये विज्ञानमें भ्रान्तिकी उत्पत्ति कभी नहीं हो सकती।” ऐसा सुनकर उस ब्राह्मणने राजकुमारसे पुनः पूछा—॥ २६ ॥ “हे राजकुमार ! ज्ञानीके द्वारा भला कर्म कैसे हो सकता है? ज्ञानाग्निका स्पर्श हो जानेपर भी कर्मरूपी कपास कैसे रह सकती है?” ॥ २७ ॥ तब राजकुमार हेमाङ्गदने भी उस ब्राह्मणसे कहा, “ब्रह्मन् ! सुनो, मैं बतलाता हूं । सभी ज्ञानियोंके कर्म समानरूपसे तीन प्रकारके होते हैं—अपक्व, पक्व और हतोदित। इनमेंसे मध्यम (पक्व) को छोड़कर शेष दो नष्ट हो जाते हैं' ॥ २८-२९ ॥ नियति (विधाता) ने कालको कर्मोंका परिपाक करनेवाला नियुक्त