त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 368, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें३५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कालेन पाचितप्रायं पक्वं कर्म समीरितम् ॥ ३० ॥ अपाचितमपक्वं स्याज्ज्ञानोत्पत्तेरनन्तरम् । कृतं हतोदितं विद्धि ज्ञानाद्धतसमुद्भवात् ॥ ३१ ॥ तत्र पक्वं तु यत् कर्म तदारब्धमितीर्यते । आवेगं मुक्तशरवत्तिष्ठत्येव फलप्रदम् ॥ ३२ ॥ तन्मूलको जगद्भासो ज्ञानस्य तारतम्यतः । स्थितोऽपि भ्रान्तितुल्योपि न भ्रान्तिः फलभेदतः ॥ ३३ ॥ जनयेत्तत्कालफलं मन्दज्ञानवतां स्फुटम् । मध्यानामस्फुटं तच्च ज्ञानिनां फलभासनम् ॥ ३४ ॥ उत्तमानान्तु तत्कालफलञ्च स्पष्टभासनम् । शशशृङ्गसमं ब्रह्मन् न हि तत्फलमुच्यते ॥ ३५ ॥ अज्ञानिनां कर्मफलं पुष्टं पूर्णानुसन्धितः । किया है। जो कर्म कालके द्वारा प्रायः परिपक्व (फलोन्मुख) कर दिये जाते हैं वे 'पक्व' कर्म कहे गये हैं ॥ ३० ॥ जो परिपक्व नहीं हुए हैं वे 'अपक्व' हैं और जो ज्ञानोत्पत्तिके पीछे किये जाते हैं उन्हें 'हतोदित' समझो, क्योंकि वे ज्ञानसे हत हुए ही उत्पन्न होते हैं ॥ ३१ ॥ इनमें जो पक्व कर्म हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं। वे छोड़े हुए बाणके समान अपना वेग रहनेतक फल प्रदान करते ही हैं ॥ ३२ ॥ ज्ञानकी न्यूनाधिकताके अनुसार उन्हींके कारण जगत्की प्रतीति बनी रहती है। वह जगत्प्रतीति भ्रान्तिके समान होनेपर भी फलमें भेद रहनेके कारण भ्रान्ति नहीं है ॥ ३३ ॥ मन्द ज्ञानियोंको यह प्रारब्ध तत्काल स्पष्ट फल प्रदान करता है। और मध्यम ज्ञानियोंको वह फलका भास अस्पष्ट होता है ॥ ३४ ॥ उत्तम ज्ञानियोंको फलका भास तत्काल एवं स्पष्ट तो होता है, किन्तु ब्रह्मन् ! उनकी दृष्टिमें वह शशशृंगके समान असत् होनेके कारण फल कहा नहीं जाता ॥ ३५ ॥ अज्ञानियोंको तो कर्मफलका अनुसन्धान पहले हीसे बना रहता है,