त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः । ३५५ पूर्वापरानुसन्धानात् पोषितं तत्फलन्तु तैः ॥ ३६ ॥ ज्ञानिनां फलसन्धानं छिन्नमात्मानुसन्धितः । अतो न पुष्टं मन्दानामारब्धजनितं फलम् ॥ ३७ ॥ मध्यानां ज्ञानिनां तच्च फलं मन्दसुषुप्तिषु । मशकादिकृतं दुःखमिव तत् सूक्ष्मतां गतम् ॥ ३८ ॥ उत्तमज्ञानिनां तत्तु फलं पूर्णमपि स्थितम् । दग्धरज्जुरिव भवेत् स्थितात्मज्ञानवैभवात् ॥ ३९ ॥ यथा नाटकवृत्तेषु नरो वेषान्तरं गतः । हृष्यन् विषीदंश्च भूयो नान्तर्विकृतिमाप्नुयात् ॥ ४० ॥ एवमेष स्थितज्ञानी सुपूर्णफलसङ्गतः । न फलैः स्पृश्यते तस्मात्तत्फलं शशशृङ्गवत् ॥ ४१ ॥ अज्ञानिभिस्तु शुद्धात्मा नोपलक्षित एव हि । इसलिये वह पुष्ट होता है। पूर्वापरका अनुसन्धान रहनेके कारण वे उस फलका पोषण करते रहते हैं ॥ ३६ ॥ ज्ञानियोंको आत्माका अनुसन्धान होता रहनेसे बीच-बीचमें उनका फलानुसन्धान टूटता रहता है। इसीसे मन्द ज्ञानियोंका प्रारब्धजनित फल पुष्ट नहीं होता ॥ ३७ ॥ मध्यम ज्ञानियोंके लिये तो वह फल, हल्की सुषुप्तिमें मच्छर आदिके काटनेसे होनेवाले दुःखके समान बहुत कम दुःख देता है ॥ ३८ ॥ उत्तम ज्ञानियोंको वह कर्मफल पूर्णतया प्राप्त होनेपर भी स्थिर आत्मज्ञानके प्रभावसे जली हुई रस्सीके समान केवल प्रतीतिमात्र रहता है ॥ ३६ ॥ जिसप्रकार नाटकमें अभिनय करते समय पुरुष अन्य वेष धारण करके हर्ष और शोककी भूमिका करनेपर भी भीतरसे किसी प्रकारके विकारको प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार यह निष्ठावान् ज्ञानी पूर्णतया फलका संग प्राप्त होनेपर भी उससे स्पृष्ट नहीं होता। इसलिये उसका वह फलभोग शशशृंगके समान केवल कथनमात्र ही होता है ॥ ४०-४१ ॥ अज्ञानियोंको तो शुद्ध आत्माका पता ही नहीं होता, इसलिये वे तो