भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 370

३५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतो देहात्मभूतास्ते दृश्यसत्त्वविमर्शनाः ॥ ४२ ॥ मन्दज्ञानिभिरात्मा तु विदितः शुद्धचिन्मयः । जगच्चासत्यतो दृष्टं तथाप्यभ्यासमान्द्यतः ॥ ४३ ॥ प्राग्वासनाहृतज्ञानास्ते देहात्मप्रभासनम् । जगतः सत्यताभासं मध्ये मध्ये समाययुः ॥ ४४ ॥ भूयो ज्ञानवासना या विधुन्वन्त्यसतीं दृशम् । वासनैवं सत्यमिथ्याज्ञानयोश्च परस्परम् ॥ ४५ ॥ मिलिता मन्दज्ञानिनामतो मध्ये फलं स्फुटम् । समेऽपि वासने चैते न हि तुल्ये महीसुर ॥ ४६ ॥ सत्यज्ञानवासनया बाध्यते वासना परा । न च मिथ्या वासनया बाध्यते सत्यवासना ॥ ४७ ॥ मिथ्यावासनयाविष्टो विस्मृतः केवलां परः । ततो मिथ्यावासनां तु विनिश्चित्य भ्रमात्मिकाम् ॥ ४८ ॥ देहको ही आत्मा समझते हैं और दृश्यको भी सत्य ही मानते हैं ॥४२॥ मन्द ज्ञानियोंको शुद्ध चिन्मय आत्माका ज्ञान होता है और उन्हें जगत् भी असत्य दिखायी देता है; तथापि अभ्यासकी कमीके कारण पूर्व वासनाओंसे उनका ज्ञान दब जाता है और देह ही आत्मभावसे भासने लगता है तथा बीच-बीचमें उन्हें जगत्की सत्यताका भान भी हो जाता है ॥ ४३-४४ ॥ किन्तु उनके जो ज्ञानके संस्कार हैं वे पुनः उनकी इस असत् दृष्टिको दूर कर देते हैं। इस प्रकार उनके सत्य और मिथ्या ज्ञानके संस्कार परस्पर मिलकर बीच-बीचमें स्पष्ट फलका भोग कराते हैं ॥ ४५-४६ पू० ॥ ब्रह्मन् ! यद्यपि ये दोनों ही संस्कार समानरूपसे आते रहते हैं, तथा इनका प्रभाव एक-जैसा नहीं होता। ज्ञानकी वासना सत्यरूप है, इसलिये उससे दृश्यकी मिथ्या वासना बाधित हो जाती है; किन्तु दृश्यकी मिथ्या वासनासे सत्यवासना बाधित नहीं होती ॥४६ उ०-४७॥ विप्रवर ! जब वह मिथ्यावासनाके अधीन होकर शुद्ध वासनाको भूल जाता है तो उस मिथ्यावासनाको भ्रमरूप निश्चय करके त्याग