भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 362

३४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तच्चां मन्ये महात्मानं ज्ञातज्ञेयं नृपूत्तमम् । इत्युक्तस्तेन विप्रेण विस्मितोऽभून्नृपात्मजः ॥ १२२ ॥ ततो भूयो नृपसुतोऽनुयुक्तस्तेन सर्वशः । वसुमन्तं बोधयित्वा सम्यक् प्रागात् पुरं स्वकम् ॥ १२३ ॥ प्रणम्य वसुमन्तं तं सहितो भ्रातृसैनिकैः । एतत्ते सर्वमाख्यातं यत् पृष्टं भार्गव त्वया ॥ १२४ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे रक्षसोपाख्यानं एकविंशतितमोऽध्यायः । छुड़ाया है। अतः मैं तुम्हें महात्मा, ज्ञातज्ञेय और राजाओंमें श्रेष्ठ समझता हूँ॥ १२१ उ०-१२२ पू० ॥ उस ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजकुमारको बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पुनः प्रश्न किये और राजकुमारने सब प्रकार वसुमान्‌का समाधान किया। फिर वह वसुमान्‌को प्रणाम कर अपने भाई तथा सैनिकोंके सहित अपने नगरको चला गया। परशुराम ! तुमने जो कुछ पूछा था वह सब मैंने तुमसे कह दिया ॥ १२२ उ०-१२४ ॥ एकविंशतितम अध्याय समाप्त।