त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः। ३४७ अधिक्षिप्तोऽपि बहुधा मया राजसभागतः ॥ ११५ ॥ शान्तस्तूष्णीं बभूवाथ शिष्यस्तस्य महात्मनः। काश्यपो मां क्रोधवशाच्छशाप नृपसंसदि ॥ ११६ ॥ आचार्यं मेऽधिक्षिपसि त्वमस्थाने द्विजाधम। यतस्तस्माच्चिरं कालं ब्रह्मरक्षो भविष्यसि ॥ ११७ ॥ शप्त एवमहं तेन भीतोऽत्यन्तं तदा मुनिम्। वेपमानः प्रणम्याशु चाष्टकं शरणं गतः ॥ ११८ ॥ मयि सोऽथ दयाञ्चक्रे विरोधिन्यपि शान्तधीः। शापस्यान्तं ददौ मह्यं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ११९ ॥ प्रश्नांस्त्वयापि हि कृतान् प्रत्युक्तांश्च मया हि तान्। स्थापितान् केवलैस्तर्कैर्यदेकः प्रतिवक्ष्यति ॥ १२० ॥ कश्चिद्विद्वांस्तदा शापाद्विमुक्तस्त्वं भविष्यसि। तच्छापादथ ते मुक्तश्चिराय नृपनन्दन ॥ १२१ ॥ राजसभा में मेरे द्वारा बार-बार आक्षेप किये जानेपर भी वे शान्त और मौन ही रहे। तब उन महात्माके काश्यप नामक शिष्यने क्रोधातुर हो उस राजसभामें मुझे शाप दिया ॥ ११५ उ०-११६ ॥ “अरे ब्राह्मणाधम ! तू अकारण ही मेरे गुरुदेवका अनादर कर रहा है, इसलिये तू दीर्घकालतक ब्रह्मराक्षस रहेगा” ॥ ११७ ॥ उसका ऐसा शाप होनेपर मैं बड़ा भयभीत हुआ और काँपते हुए उन अष्टक मुनिको प्रणाम कर उन्हींकी शरणमें गया ॥ ११८ ॥ मुनि शान्तचित्त थे, अतः विरोधी होनेपर भी मुनिने मुझपर दया की। उन्होंने उस शापका जो अन्त निश्चित किया वह मैं बतलाता हूँ, सुनो ॥ ११९ ॥ तुमने मुझसे जो प्रश्न किये और मेरे समाधान करनेपर भी तुमने केवल तर्कके बलसे उन्हें खड़े रखा, उनका जब कोई एक ही विद्वान् समाधान कर देगा, उस समय तुम इस शापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १२०-१२१ पू० ॥ राजकुमार ! अब बहुत समय बीतनेपर तुमने मुझे उस शापसे