त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः । ३४३ को वा कर्तृत्वाभिमानो वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९० ॥ अविवेकोऽपृथग्ज्ञानमात्मानं पृच्छ स्वात्मनि । तद्वासनाभिमानः स्याच्छृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९१ ॥ अविवेकः केन नश्येत्तस्य किं वा हि कारणम् । तस्यापि किं कारणं स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९२ ॥ विचारेण स नश्येद्वै वैराग्यं तस्य कारणम् । तत्कारणं दोषदृष्टिः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९३ ॥ को विचारो भवेत् किं वा वैराग्यं सम्प्रचक्षते । दोषदृष्टिश्च का प्रोक्ता वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९४ ॥ दृग्दृश्ययोः परीक्षातो दृश्ये तत्परिवर्जनम् । दुःखबुद्धिः सा हि दृश्ये शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९५ ॥ एतत् सर्वं केन भवेत् स वा कस्मादवाप्यते । और स्वयं (आत्मा) क्या है? तथा कर्तापनका अभिमान किसे कहते हैं ॥ ६० ॥ उ०-ब्रह्मराक्षस ! सुन, देहादिसे आत्माको भिन्न न समझना अविवेक है, आत्मा क्या है—यह अपनेहीसे पूछ ले तथा 'मैं करता हूँ' ऐसी वासना ही कर्तापनका अभिमान है ॥ ६१ ॥ प्र०-राजकुमार ! बताओ, अविवेकका नाश कैसे हो सकता है ? उसका कारण क्या है और उस कारणका भी क्या कारण है ? ॥ ६२ ॥ उ०-ब्रह्मराक्षस ! सुन, अविवेकका नाश विचारसे होता है ! उसका कारण वैराग्य है और वैराग्यका कारण है विषयोंमें दोषदृष्टि ॥ ६३ ॥ प्र०-राजकुमार ! यह बताओ कि विचार क्या है ? वैराग्य किसे कहते हैं और दोषदृष्टि क्या कहलाती हैं ? ॥ ६४ ॥ उ०-ब्रह्मराक्षस ! सुन, द्रष्टा और दृश्यकी पहचान करना विचार है, दृश्यमें राग न रखना वैराग्य है और दृश्यमें दुःखबुद्धि हो जाना दोषदृष्टि है ॥ ६५ ॥ प्र०-राजकुमार ! यह बतलाओ कि ये सब होंगे कैसे ? और के