त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे उपलब्ध्या च किं वा स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ ८४ ॥ धीः स्थानमुपलब्धौ तु स्वैकाग्र्यात् सोपलभ्यते । उपलब्ध्या जनिर्न स्याच्छृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८५ ॥ धीः केयं समाख्याता तदैकाग्र्यं च कीदृशम् । जनिर्वापि भवेत् का सा वदैतन्नृपनन्दन ॥ ८६ ॥ चितिर्जाड्यावृता धीः स्यादैकाग्र्यं स्वात्मविश्रमः । जनिर्देहात्मताबुद्धिः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८७ ॥ कस्माच्चितेर्नोपलब्धिः केन वा सोपलभ्यते । जनिः कथं वा सम्प्राप्ता वदैतन्नृपनन्दन ॥ ८८ ॥ अविवेकान्नोपलब्धिरात्मना सोपलभ्यते । जनिः कर्तृत्वाभिमानाच्छृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८९ ॥ कोऽविवेकस्त्वया प्रोक्तस्तथात्मा वापि को भवेत् । किस प्रकार उसकी उपलब्धि होती है ? और उसे उपलब्ध कर लेनेसे क्या होता है ? ॥ ८४ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, उसकी उपलब्धिका स्थान बुद्धि है, चित्तकी एकाग्रतासे उसकी उपलब्धि होती है और उसे उपलब्ध कर लेनेपर फिर जन्म नहीं होता ॥ ८५ ॥ प्र०—राजकुमार ! बताओ, बुद्धि किसे कहते हैं ? उसकी एकाग्रता कैसी होती है ? और जन्म लेना क्या है ? ॥ ८६ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जड़ता (अविद्या) से आवृत चिति ही बुद्धि है, अपने आत्मामें ठहर जाना एकाग्रता है और देहमें आत्मबुद्धि ही जन्म है ॥ ८७ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि चिति उपलब्ध क्यों नहीं होती ? वह किस साधनसे उपलब्ध होती है ? और जन्मकी प्राप्ति कैसे हुई है ? ॥ ८८ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, अविवेकके कारण उपलब्धि नहीं होती, वह स्वयं ही उपलब्ध होती है और जन्मकी प्राप्ति हुई है कर्तापनके अभिमानसे ॥ ८९ ॥ प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि तुमने अविवेक किसे कहा ?