त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः । ३४१ ततो हेमाङ्गदः प्राह पृच्छ तान् संवदामि ते ॥ ७८ ॥ इत्युक्तो नृपपुत्रं तं पप्रच्छ ब्रह्मराक्षसः । गूढप्रश्नान् क्रमेणैव तद्वक्ष्ये शृणु भार्गव ॥ ७९ ॥ आकाशाद्वितता या स्यात् सूक्ष्मा च परमाणुतः । सा किंरूपा स्थिता कुत्र वदैतन्नृपपुत्रक ॥ ८० ॥ वितता चितिराकाशात् सूक्ष्मा च परमाणुतः । स्फुरद्रूपा स्वात्मसंस्था शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८१ ॥ एकापि साऽतिवितता कथं सूक्ष्मतरा भवेत् । स्फुरत्त्वं किं किमात्मा च वदैतन्नृपनन्दन ॥ ८२ ॥ कारणत्वाद्वि वितता सूक्ष्मा ग्राह्यत्वतोऽपि च । स्फुरत्त्वमात्मा च चितिः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ८३ ॥ स्थानं तदुपलब्धौ किं कथं वा सोपलभ्यते । तब हेमाङ्गदने कहा, “पूछो, मैं उनका उत्तर दूँगा।” ऐसा कहे जानेपर ब्रह्मराक्षसने उस राजकुमारसे बड़े गूढ प्रश्न किये। परशुराम ! सुनो, मैं उनका वर्णन करता हूँ—॥ ७८ उ०-७९ ॥ प्र०—राजकुमार ! बतलाओ, जो वस्तु आकाशसे भी अधिक विस्तृत और परमाणुसे भी अधिक सूक्ष्म है, उसका क्या स्वरूप है और वह कहाँ है ? ॥ ८० ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, चिति आकाशसे भी विस्तृत और परमाणुसे भी सूक्ष्म है। वह स्फुरणरूपा है और अपने आत्मामें ही स्थित है ॥ ८१ ॥ प्र०—राजपुत्र ! वह एक ही होनेपर भी अत्यन्त विस्तृत और अत्यन्त सूक्ष्म कैसे हो सकती है ? स्फुरण क्या है और आत्मा क्या है—यह बताओ ॥ ८२ ॥ उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, सबका कारण होनेके कारण तो वह विस्तृत है और इन्द्रिय आदि से ग्राह्य न होनेके कारण सूक्ष्म है। तथा स्फुरण और आत्मा चितिको ही कहते हैं ॥ ८३ ॥ प्र०—राजकुमार ! बताओ, उसकी उपलब्धि का स्थान क्या है .