त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः । ३२७ निर्भयो व्यवहारेषु स सिद्धेषूत्तमो मतः । सर्वं सुखञ्च दुःखञ्च व्यवहारञ्च जागतम् ॥ १३० ॥ स्वात्मन्येवाभिजानाति स सिद्धेषूत्तमो मतः । अत्यन्तं बद्धमात्मानं मुक्तञ्चापि प्रपश्यति ॥ १३१ ॥ यः स्वात्मनि तु सर्वात्मा स सिद्धेषूत्तमो मतः । यः पश्यन् बन्धजालानि सर्वदा स्वात्मनि स्फुटम् ॥ १३२ ॥ मोक्षं नापेक्षते क्वापि स सिद्धेषूत्तमो मतः । सिद्धोत्तमोऽहमेवेह न भेदस्त्वावयोः क्वचित् ॥ १३३ ॥ एतद्वो ऋषयः प्रोक्तं सुस्पष्टमनुयुक्त्या । एतन्मयोक्तं विज्ञाय न क्वचित् परिमुह्यते ॥ १३४ ॥ इत्युक्ता सा परा विद्या विरराम भृगूद्वह । श्रुत्वैतदृषयः सर्वे सन्देहमपहाय च ॥ १३५ ॥ हारमें किसी प्रकारका भय नहीं है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२६ उ०-१३० पू० ॥ जो सम्पूर्ण सुख, दुःख और संसारके व्यवहारको अपने आत्मा- में ही भासमान समझता है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३० उ०-१३१ पू० ॥ जो अत्यन्त बद्ध और मुक्त पुरुषको भी अपने स्वरूपमें ही देखता है वह सर्वात्मा सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३१ उ०-१३२ पू० ॥ जो सम्पूर्ण बन्धनोंको भी सर्वदा स्पष्टतया अपने आत्मस्वरूपमें ही भासमान देखनेके कारण कभी मोक्षकी भी इच्छा नहीं करता वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३२ उ०-१३३ पू० ॥ अधिक क्या वह श्रेष्ठ सिद्ध मैं ही हूँ। मेरा और उसका कभी कोई अन्तर नहीं है। ऋषियो ! यह मैंने तुम्हारे प्रश्नोंका स्पष्ट उत्तर दे दिया। मेरे इस कथन को ठीक-ठीक समझ लेनेपर फिर मोह नहीं होता ॥ १३३ उ०-१३४ ॥ भृगुनन्दन ! ऐसा कहकर वह परा विद्या मौन हो गयी। उसका उपदेश सुनकर सभी ऋषियोंका सन्देह दूर हो गया तथा वे