त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वत्र व्यवहारेषु यत्नात् संस्कारबोधतः । यदा प्रवृत्तिस्सिद्धेः सा पराकाष्ठा समीरिता ॥ १२३ ॥ अयत्नेनैव परमे स्थितिः संवेदनात्मनि । अव्याहता यदा सिद्धिस्तदा काष्ठां समागता ॥ १२४ ॥ व्यवहारपरो भावान् पश्यन्नपि न पश्यति । द्वैतं तदा हि सा सिद्धिः पूर्णतामभिसङ्गता ॥ १२५ ॥ जागरादौ व्यवहरन्नपि निद्रितवद्यदा । स्थितिस्तदा हि सा सिद्धिः पूर्णतामभिसङ्गता ॥ १२६ ॥ एवं सिद्धिमनुप्राप्तः सिद्धेषूत्तम उच्यते । व्यवहारपरो नित्यं न समाधिं विमुञ्चति ॥ १२७ ॥ कदाचिदपि मेधावी स सिद्धेषूत्तमो मतः । ज्ञानिनां विविधानां च स्थितिं जानाति सर्वदा ॥ १२८ ॥ स्वानुभूत्या स्वान्तरेव स सिद्धेषूत्तमो मतः । संशयो वापि कामो वा यस्य नास्त्येव लेशतः ॥ १२९ ॥ जिस समय पूर्व-संस्कार उदित होनेपर सब व्यवहारोंमें प्रयत्न करनेपर प्रवृत्ति हो उसे सिद्धिकी पराकाष्ठा कहा है ॥ १२३ ॥ तथा बिना प्रयत्न ही ज्ञानस्वरूप परमतत्त्वमें निरन्तर स्थिति रहे तब सिद्धिकी पराकाष्ठा हो जाती है ॥ १२४ ॥ जिस समय व्यवहारमें लगे रहनेपर भी विभिन्न वस्तुओंको और द्वैतको देखते हुए भी नहीं देखता तो उस समय वह उत्तमा सिद्धि पूर्णताको प्राप्त हो जाती है। जब जाग्रत आदि अवस्थाओंमें व्यवहार करते हुए भी सोये हुएके समान रहे तब ही वह सिद्धि पूर्णताको प्राप्त होती है। इस प्रकारकी सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष सिद्धोंमें श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ १२५-१२७ पू० ॥ जो निरन्तर व्यवहारमें लगा रहनेपर भी कभी समाधिको नहीं छोड़ता वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२७ उ०-१२८ पू० ॥ जो अपने अनुभवके द्वारा अपनी ही तरह अन्य ज्ञानियोंकी विभिन्न स्थितियोंको भी सर्वदा जान लेता है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १२८ उ०-१२६ पू० ॥ जिसे लेशमात्र भी संशय या कामना नहीं है तथा व्यव-