त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः। १२५ अप्यस्खलितवर्णा या पठिता श्रुतिरुत्तमा । समाहितस्य व्यापारेऽसमाहितस्य चान्यदा ॥ ११७ ॥ पूर्ववद्याऽप्यस्खलिता पठिता मध्यमा श्रुतिः । या सदा ह्यनुसन्धानयोगादेव भवेत्तथा ॥ ११८ ॥ पठिता श्रुतिरत्यन्तास्खलिता मध्यमा हि सा । एवमेवात्मविज्ञानसिद्धिरुक्ता त्रिधर्षयः ॥ ११९ ॥ या महाव्यवहारेषु प्रतिसन्धानवर्जने । अन्यदा तद्वर्जने वा सर्वदा प्रतिसन्धितः ॥ १२० ॥ अन्यूनाधिकभावा स्यात् सोत्तमा मध्यमाऽधमा । अत्रोत्तमैव संसिद्धेः पराकाष्ठा निरूपिता ॥ १२१ ॥ स्वप्नादिष्वप्यवस्थासु यदा स्यात् परमा स्थितिः । विचारक्षणतुल्येव सिद्धिः सा परमोत्तमा ॥ १२२ ॥
पाठमें सैकड़ों व्यापारोंके रहते हुए भी वर्ण या स्वरमें अन्तर नहीं आता वह उत्तम श्रुति है ॥ ११६ उ०-११७ पू० ॥ व्यापारके समय समाहित ( सावधान ) रहनेपर और अन्य समय ( व्यापारका झंझट न होनेपर ) समाहित न रहनेपर भी जो पहले ही की तरह अस्खलितरूपसे पढ़ी जा सकती है वह मध्यम श्रुति है ॥ ११७ उ०-११८ पू० ॥ जो सर्वदा अनुसन्धानपूर्वक ही पढ़ी जाती है और जिसमें बहुत-सी भूलें भी रहती हैं वह अधमा श्रुति है ॥ ११८ उ०-११९ पू० ॥ ऋषियो ! उसी प्रकार आत्मविज्ञानकी सिद्धि भी तीन प्रकारकी कही गयी है । जो बहुत अधिक व्यवहार होनेपर अथवा अनुसन्धान न करनेपर भी रहती है वह उत्तम, जो व्यापार न रहनेपर ही स्वभावसिद्ध है वह मध्यम और जो सर्वदा आत्मानुसन्धान करते रहनेपर ही न्यूनाधिक भावसे रहित रहती है वह अधम सिद्धि है । इनमें उत्तम ही सिद्धिकी पराकाष्ठा कही गयी है ॥ ११९ उ०-१२१ ॥ जिस समय स्वप्नादि अवस्थाओंमें भी विचारकालकी तरह ही उत्तम स्थिति रहे वह सिद्धि परम उत्तम मानी गयी है ॥ १२२ ॥