भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 338

३२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वात्मविद्यासाधनेषु ताः सर्वाः सुप्रतिष्ठिताः ॥ ११० ॥ आत्मविद्याविधावेतास्त्वन्तरायप्रयोजकाः । किं ताभिरिन्द्रजालात्मसिद्धितुल्याभिरीहितम् ॥ १११ ॥ यस्य साक्षाद् ब्रह्मपदमपि स्यात्तृणसम्मितम् । कियन्त्येताः सिद्धयो वै कालक्षेपणहेतवः ॥ ११२ ॥ तस्मात् सिद्धिर्नेतरा स्यादात्मविज्ञानसिद्धितः । ययाऽत्यन्तशोकनाशो भवेदानन्दसान्द्रता ॥ ११३ ॥ सैव सिद्धिर्नेतरा तु मृत्युग्रासविमोचिनी । इयमात्मज्ञानसिद्धिर्विविधाऽभ्यासभेदतः ॥ ११४ ॥ बुद्धिर्नैर्मल्यभेदाच्च परिपाकविभेदतः । संक्षेपतस्तु त्रिविधा चोत्तमा मध्यमाऽधमा ॥ ११५ ॥ लोके द्विजानामृषयः पठिता श्रुतिसम्मिता । मेधया च महाभ्यासाद्व्यापारशतसङ्कुला ॥ ११६ ॥ आत्मज्ञानके साधनोंमें ही प्रतिष्ठित हैं। [ अर्थात् साधन करते-करते वे स्वयं ही आ जाती हैं ] ॥ ११० ॥ किन्तु वे आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें तो विघ्न करनेवाली हैं, भला जिज्ञासुको इन्द्रजालिकके चमत्कारों-जैसी उन सिद्धियोंसे क्या लेना है ॥ १११ ॥ जिसकी दृष्टिमें साक्षात् ब्रह्माका पद भी तृणके समान है उसके लिये केवल समय काटनेमें उपयोगी इन सिद्धियोंका क्या मूल्य है ? ॥ ११२ ॥ अतः आत्मविज्ञानरूपा सिद्धिसे बढ़कर और कोई सिद्धि नहीं है, जिससे कि शोकका सर्वथा नाश और आनन्दघनताकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ११३ ॥ कालके गालसे बचानेवाली भी केवल वही सिद्धि है, कोई अन्य नहीं। अभ्यास, बुद्धिकी शुद्धि और ज्ञानकी पुष्टिके तारतम्यसे यह आत्म- ज्ञानरूपा सिद्धि अनेक प्रकारकी है। किन्तु ऋषियो ! लोकमें ब्राह्मण द्वारा पढ़ी हुई श्रुतिके समान यह तीन प्रकार की है—उत्तम, मध्यम और अधम ॥ ११४-११६ पू० ॥ बुद्धिकी प्रखरता और अत्यन्त अभ्यासके कारण जिस श्रुतिके