त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः । ३२१ कामादिवासितस्यैवं श्रुतं चाश्रुतसम्मितम् । कामादिवासनां तस्माज्जयेद्वैराग्यसम्पदा ॥ ९१ ॥ सन्ति कामक्रोधमुखा वासनास्तु सहस्रशः । तत्र कामो मूलभूतस्तन्नाशे न हि किञ्चन ॥ ९२ ॥ ततो वैराग्यसंयोगान्नाशयेत् कामवासनाम् । आशा हि कामः संप्रोक्त एतन्मे स्यादिति स्थिता ॥ ९३ ॥ शक्येषु स्थूलभूता सा सूक्ष्माऽशक्येषु संस्थिता । दृढवैराग्ययोगेन सर्वां तां प्रविनाशयेत् ॥ ९४ ॥ तत्र मूलं काम्यदोषपरामर्शः प्रतिक्षणम् । वैमुख्यं विषयेभ्यश्च वासना नाशयेदिति ॥ ९५ ॥ यस्तृतीयो बुद्धिदोषो जाड्यरूपो व्यवस्थितः । असाध्यः सोऽभ्यासमुखैः सर्वथा ऋषिसत्तमाः ॥ ९६ ॥ येन तात्पर्यतश्चापि श्रुतं बुद्धिमनारुहेत् । अतः जिसका चित्त कामादि वासनाओंसे भरा है उसका शास्त्र- श्रवण तो न सुननेके ही समान है। अतः वैराग्यरूप सम्पत्तिसे कामादि वासनाओंको वशमें करे ॥ ६१ ॥ काम-क्रोधादि वासनाएँ तो हजारों हैं। उनमें काम सबका मूल है। उसका नाश होनेपर कोई वासना नहीं रहती ॥ ६२ ॥ अतः वैराग्यकी सहायतासे कामवासनाको नष्ट करे। आशा ही काम कही जाती है, जो 'मुझे यह मिल जाय' इस रूपमें रहती है॥६३॥ जो पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं उनमें वह स्थूल रूपमें रहती है और जिनकी प्राप्ति नहीं हो सकती उनमें सूक्ष्म रूपसे । उस सभी प्रकारकी आशाको दृढ वैराग्यके द्वारा नष्ट कर देना चाहिये ॥ ६४ ॥ उसका मूल साधन है प्रतिक्षण काम्य · वस्तुओंका दोषचि- न्तन। विषयोंसे विमुखता रहेगी तो वह उनकी वासनाओंको नष्ट कर देगी ॥ ६५ ॥ बुद्धिका जडतारूप जो तीसरा दोष है, मुनिवरो ! उसे अभ्या- सादिके द्वारा निवृत्त करना तो सर्वथा असम्भव है ॥ ६६ ॥ जिसके कारण तत्परतापूर्वक सुनीहुई बात भी बुद्धिमें नहीं