भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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श्लोकानुक्रमणिका ३८१ त्वया किञ्चि १३४ | देशकालान २० | न तन्मया १११ त्वया तु १९० | देशभेदेषु ४९ | न तवाभिमतं ३६ द | देशान्तरा १७३ | न तां विहाय ५९ दग्धं ३३९ | देहवृत्त १८५ | न ताभिरीपद्वा ३०० दत्तात्रेय २७ | देहात्मत्व ३३६ | न ते सुवि २१० ददृशुस्तत्र १६२ | देहाहं ३६२ | न ते छवि १०३ दस्युविंधं ३०९ | देहे देहा २४२ | न त्वं देह १८१ दयमान १८ | देहेन्द्रिया २५५ | न त्वं शरीरं २२६ दर्पण ३५२ | द्रष्टृदर्शन २६९ | नत्वा ३२८ दर्पण ३५२ | द्वितीयलेशं १९८ | न दृश्यं ११५ दर्पणप्रति १५५ | द्वितीयसुत ६५ | न फलं २४७ दर्पणे १५५ | द्वितीया २९२ | न बन्धनाय ३३५ दर्पणे च १५४ | द्विधात्रिधा ३६६ | न बाधितः १८४ दर्शनं २३८ | द्विविधः ३१९ | न भवेत्तत्र ७१ दशासु २४० | द्वीपस्तत्र १९४ | न भेदो ३५७ दिदृक्षुश्च २२८ | द्वैतं जगत् १९८ | न मां जहौ ६० दिनैर्मासै ३१९ | द्वैतज्ञानन्तु ३१४ | न मुख्य २९२ दीपप्रभा २७८ | ध | न मोक्षो २६२ दीपसूर्या १९५ | धन्या प्रिये ११४ | न वा भूयोऽपि ३०० दुःखभार ६९ | धन्यासि ८९ | नान्येऽनुवृत्त्य १८४ दुःखेन क्लिश्य २६ | धन्यांसि २१ | नष्टाखिलार्थ ५६ दुःखैरभि १३३ | धर्मेण यः ३२ | न संस्मरति १४१ दुर्लभ्यः ३४५ | धावन् १२८ | न स्त्रियः ४५ दुष्टस्त्री ७६ | धिग्धे स्त्रीष्व ४५ | न स्वरूपे २७५ दूरे किञ्चित् २४२ | धीः केयं ३४२ | न स्वस्थितेः २८६ दूषयित्वा ३४६ | धीःस्थान ३४२ | न हि पीत १४७ दृगस्ति ३४५ | धैर्यमालम्ब्य १९० | न विजानन्ति २४७ दृढापराध ३०० | ध्यानस्य २५१ | न हि निष्कारणं २९४ दृश्यन्ति ४८ | ध्यायाम्ये ३७ | न ह्यण्वपि ५८ दृश्यन्ते १५० | न | नह्यात्मा २७१ दृश्यांशमे ३६३ | न किञ्चिदपि ३६२ | न ह्यादेश ११५ दृष्ट एवास्य १८८ | न किञ्चिद्वा २२९ | नाकाशतुल्यं २७१ दृष्टमेतत् ९९ | न कुतः साधनं २७ | नातोऽधिकं २५२ देवता ३४४ | न केनचित्त ४० | नाद्यगा १०९ देवना ३५४ | न जागरस्थ १८६ | नात्र रूपं १३० देवराता ३३९ | न जानाति २४६ | नात्र हेतुं १२२ देवाद्दिति ११५ | न तत् ४० | नात्राचार्य ११६ देवि भूयो ३१० | न तत्र ५२ | नाथ किं १३२ देशः कालो २०४ | न तत्स्वयं २१७ | नाथ प्रोक्तं ८१