त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स ददर्श विगाहन्तीं नदीं तां लोकसुन्दरीम् । क्लिन्नांशुकान्तरात्यन्तव्यक्तपीनकुचद्वयीम् ॥ ३२ ॥ कामवाणहतस्तत्र तां प्रार्थयदथापि सा । सौन्दर्यमोहिता तस्य तदुक्तिं सममंसत ॥ ३३ ॥ सङ्गम्याथ तया राजा ययौ स्वनगरं प्रति । दधार सापि विद्याधरी गर्भं राजर्षिवीर्यतः ॥ ३४ ॥ भीतापचारात् पत्युः सा गर्भं त्यक्त्वात्र संययौ । अमोघवीर्याद्राजर्षेर्जाताहं कन्यका ततः ॥ ३५ ॥ मां ददर्श व्याघ्रपादः सन्ध्योपास्त्यर्थमागतः । दयया मामुपादायापालयज्जननी यथा ॥ ३६ ॥ धर्मेण यः पालयिता प्रोच्यते हि पितैव सः । अहन्तस्य धर्मपुत्री पितृसेवापरायणा ॥ ३७ ॥ उन्होंने उस त्रिलोकसुन्दरी विद्याधरीको नदीमें स्नान करते देखा। उसके जलमें भीगे झीने वस्त्रोंमेंसे दोनों पीन पयोधर दिखाई दे रहे थे ॥ ३२ ॥ इससे राजा सुषेण कामबाणसे बिंधगये और उस विद्याधरीसे उन्होंने प्रार्थना भी कर दी। राजाके सौन्दर्यसे मोहित होकर उसने उनकी बात मान ली ॥ ३३ ॥ उसके साथ समागम करके राजा अपने नगरको चले गये। उस विद्याधरीको राजाके वीर्यसे गर्भ रह गया ॥ ३४ ॥ किन्तु इस व्यभिचारके कारण पतिके डरसे वह गर्भको वहीं छोड़कर चली गयी। तब राजाके उस अमोघ वीर्यसे मैं कन्या उत्पन्न हुई ॥ ३५ ॥ जब सन्ध्योपासनके लिये वहाँ व्याघ्रपाद मुनि आये तो उन्होंने मुझे देखा। वे दयावश मुझे उठा लाये और माताके समान मेरा पालन करने लगे ॥ ३६ ॥ जो धर्मपूर्वक पालन करता है वह पिता ही कहा जाता है। अतः मैं उनकी धर्मपुत्री हूँ और पिताजीकी सेवा करती रहती हूँ ॥ ३७ ॥