त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः । ३३ तस्य माहात्म्यतो मेऽत्र भयं नास्त्येव कुत्रचित् । नायं सुरासुरैर्वापि कदाचिद् दुष्टबुद्धिभिः ॥ ३८ ॥ प्रवेष्टुमाश्रमोऽर्हः स्यात् प्रविशन्नाशमाप्नुयात् । एतन्मेऽभिहितं वृत्तं तिष्ठ किञ्चिन्नृपात्मज ॥ ३९ ॥ आयास्यति स भगवान् पिता मे तं निशामय । प्रणम्य तं प्राप्य चेष्टं ततः कल्ये प्रयास्यसि ॥ ४० ॥ हेमलेखावचः श्रुत्वा तत्सौन्दर्येण मोहितः । भीतः किञ्चित् प्रवक्तुं तां विमना इव चाभवत् ॥ ४१ ॥ अथालक्ष्य राजपुत्रं कामस्य वशमागतम् । प्राह सा विदुषी भूयो राजपुत्र धृतिं भज ॥ ४२ ॥ आगच्छति पिता सद्यस्ततोऽभिलषितं भज । एवं वदन्त्यां तस्यां स व्याघ्रपादो महामुनिः ॥ ४३ ॥ आजगाम वनाद्यत्र पुष्पादेः कृतसञ्चयः । मुनिं समागतं दृष्ट्वा राजपुत्रः समुत्थितः ॥ ४४ ॥ उनके प्रभावसे मुझे यहाँ कहीं भी किसी प्रकारका भय नहीं है। इस आश्रममें कोई देवता या असुर भी दूषित विचारसे प्रवेश नहीं कर सकता। यदि करेगा तो नष्ट हो जायगा। यह मैंने अपना वृत्तान्त सुनाया। राजपुत्र ! आप कुछ देर यहाँ ठहरिये ॥ ३८-३९ ॥ मेरे पिता भगवान् व्याघ्रपाद आने ही वाले हैं। उनके दर्शन करें और उन्हें प्रणाम करके अपना मनोरथ पूरा कराकर कल प्रातःकाल प्रस्थान करें” ॥ ४० ॥ हेमलेखाकी बात सुनकर उसके सौन्दर्यसे मोहित हो जानेके कारण राजपुत्रने कुछ कहना चाहा, किन्तु बोलनेका साहस न होनेके कारण वह कुछ अनमना-सा हो गया ॥ ४१ ॥ उसे कामके वशीभूत देख विदुषी हेमलेखाने उससे फिर कहा, “राजपुत्र ! धैर्य धारण करो ॥ ४२ ॥ पिताजी शीघ्र ही आते होंगे। तब अपनी अभिलाषा पूरी कर लेना।” उसके ऐसा कहते ही महामुनि व्याघ्रपाद वनसे पुष्पादि संग्रह करके आ गये। उन्हें आये देखकर राजपुत्र खड़ा हो गया ॥ ४३-४४ ॥