भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विमुख्यां त्वयि भोगेषु विषयेषु सुखं मम । कथं भवेद्दारुयोषासङ्गतस्येव तद्वत् ॥ ५७ ॥ न तवाभिमतं त्यक्त्वा किञ्चिन्मम समीहितम् । सर्वथा त्वामनुगतो ज्योत्स्नां कुमुद्वत् किल ॥ ५८ ॥ तदेवं ते कुतश्चित्तं ब्रूहि प्राणाधिकप्रिये । येन शुद्धयेत् तु मच्चित्तं शापितासि मया प्रिये ॥ ५९ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विचारमाहात्म्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ जब तुम इस प्रकार भोगोंसे विमुख रहोगी तो बताओ काठकी पुतलीके साथ रहनेवाले पुरुषके समान मुझे भी विषयोंसे क्या सुख मिलेगा ? ॥ ५७ ॥ जो तुम्हें अच्छा लगता है उसे छोड़कर तो मुझे कुछ भी करनेकी इच्छा नहीं होती। कुमुद् जिस प्रकार चन्द्रिका का अनुसरण करता है उसी प्रकार मैं तो सब प्रकार तुम्हारा ही अनुगत हूँ ॥ ५८ ॥ तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो। बताओ तो तुम्हारा चित्त ऐसा विषयविमुख क्यों हो गया है। प्रिये ! तुम्हें मेरी सौगन्ध है। बोलो, जिससे मेरे मनका समाधान हो” ॥ ५९ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ।