त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ प्रियस्य कण्ठासक्तस्य निशम्यैवं वचो हि सा । ईषत्स्मितानना प्राह राजपुत्रमनिन्दिता ॥ १ ॥ बुबोधयिषती राजपुत्रं युक्त्याऽब्रवीदिदम् । राजपुत्र शृणु वचो नाहं त्वयि विरागिणी ॥ २ ॥ किं स्यात् प्रियतमं लोके किंनु स्यादप्रियन्त्विति । विचारयन्त्या नित्यं नान्तमेत्यत्र मे मतिः ॥ ३ ॥ ध्यायाम्येतच्चिरान्नित्यं स्त्रीस्वभाववशादहम् । नैतज्जानामि तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ४ ॥ एवं प्रोक्तो हेमचूडः प्रहस्य प्राह तां प्रियाम् । नूनं स्त्रियो मूढधिय इति सत्यं न संशयः ॥ ५ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ हेमचूड-प्रबोध गलेसे लगे प्रियतमका ऐसा भाषण सुनकर वह निर्दोष बाला कुछ मुसकराहटके साथ राजकुमारसे कहने लगी ॥ १ ॥ वह राजपुत्रको तत्त्वका बोध कराना चाहती थी, इसलिये उसने इस प्रकार युक्तिपूर्वक बोलना आरम्भ किया, “राजकुमार ! सुनिये, मेरा आपके प्रति प्रेम न हो—ऐसी बात नहीं है ॥ २ ॥ किन्तु मैं हर समय इसी उधेड़-बुनमें रहती हूँ कि लोकमें सबसे बढ़कर प्रिय कौन वस्तु है और अप्रिय क्या है। मेरी बुद्धि इसका कोई निर्णय नहीं कर पाती है ॥ ३ ॥ मैं बहुत दिनोंसे बराबर यही सोच रही हूँ। किन्तु स्त्रीस्वभाव होनेके कारण इस रहस्यको मैं समझ नहीं सकी। आप इसका ठीक- ठीक विवेचन कर दीजिये” ॥ ४ ॥ हेमलेखाके इस प्रकार कहने पर हेमचूडने हँसकर अपनी प्रियासे कहा, “सचमुच इसमें सन्देह नहीं कि स्त्रियाँ मूढबुद्धि होती हैं ॥ ५ ॥