त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्रियाप्रिये हि जानन्ति पशुपक्षिसरीसृपाः । यतस्तेषां दृश्यते हि प्रियेष्वप्रियकेषु च ॥ ६ ॥ प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च किमत्र बहु चिन्तनम् । सुखं यस्मात् तत् प्रियं स्याद् दुःखं यस्मात्तदप्रियम् ॥ ७ ॥ किमत्र मुग्धभावेन नित्यं चिन्तयसि प्रिये । श्रुत्वा प्रियवचः प्राह हेमलेखा पुनः प्रियम् ॥ ८ ॥ सत्यं स्त्रियो मुग्धभावा नास्त्यासां सद्विमर्शनम् । तथाप्यहं बोधनीया त्वया सम्यग्विमर्शिना ॥ ९ ॥ सुबोधिता त्वया चाहं चिन्तामेतां विसृज्य तु । त्वया भोगेषु सततं भवाम्यनुदिनं ततः ॥ १० ॥ राजन् सुखञ्च दुःखञ्च याभ्यां भवति ते ननु । प्रियाप्रिये विनिर्दिष्टे त्वया सूक्ष्मविमर्शिना ॥ ११ ॥ पिय और अप्रियकी पहचान तो पशु, पक्षी और कीड़े-मकोड़ोंको भी होती है; क्यों कि उनकी भी अपने प्रियके प्रति प्रवृत्ति और अप्रिय- की ओरसे निवृत्ति देखी जाती है। इसमें बहुत सोचनेकी क्या बात है ? जिससे सुखदो वह प्रिय और जिससे दुःख हो वह अप्रिय होता है ॥ ६-७ ॥ प्रिये ! तुम बड़ी भोली हो, भला, इस विषयमें तुम निरन्तर क्या सोचती रहती हो ?” प्रियतमकी यह बात सुनकर हेमलेखाने उससे फिर कहा—॥ ८ ॥ “स्त्रियाँ मूढ होती हैं—यह तो ठीक ही है, इनमें वास्तविक वस्तुका विचार करनेकी योग्यता नहीं होती । परन्तु आप तो बड़े विचारवान् हैं, अतः मुझे समझा दीजिये ॥ ९ ॥ आपके समझा देने पर मैं इस चिन्ताको छोड़कर फिर सर्वदा आपके साथ भोगोंमें ही तत्पर रहूँगी ॥ १० ॥ राजन् ! आप बड़े सूक्ष्मदर्शी हैं। आपने बताया कि जिनसे सुख और दुःख हो वे ही क्रमशः प्रिय और अप्रिय हैं ॥ ११ ॥