भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः । ३६ एकमेव सुखं दुःखं कालदेशाकृतेर्भिदा । जनयेदत्र तत् कस्मात् प्रतिष्ठाध्यवसायिनी ॥ १२ ॥ यतो वह्निः कालभेदात् पृथगेव फलप्रदः । तथा देशविभेदेनाप्याकारस्य विभेदतः ॥ १३ ॥ शीतकाले प्रियो वह्निरुष्णे त्वप्रिय एव हि । हिमोष्णदेशभेदेन प्रियश्चाप्रिय एव च ॥ १४ ॥ शीतप्रकृतिजीवानां प्रियोऽन्येषां तथेतरः । अथाप्यधिकभावेनाल्पभावेनैवमीरितः ॥ १५ ॥ एवं शीतं धनं दाराः पुत्रा राज्यं तथेतरत् । अथाप्येवं महाराजो दारपुत्रधनैर्वृतः ॥ १६ ॥ शोचत्यनुदिनं कस्मान्न शोचन्तीतरे कुतः । योऽयं भोगः सुखार्थोऽस्ति सोऽप्यनन्तो भवेन्न तु ॥ १७ ॥ किन्तु जब एक ही वस्तु काल, देश और आकृतिका भेद होनेपर सुख-दुःख दोनोंही देती हो तो उसकी एकरूपताका निश्चय कैसे हो सकता है ? ॥ १२ ॥ जिस प्रकार अग्नि कालभेदसे अलग-अलग फल देनेवाली है उसी प्रकार देश और आकृतिके भेदसे भी उसके विभिन्न फल होते हैं ॥ १३॥ अग्नि शीतकालमें तो प्रिय होती है किन्तु ग्रीष्ममें अप्रिय ही है । इसी तरह शीत और उष्ण देशोंके भेदसे भी वह प्रिय और अप्रिय ही है ॥ १४ ॥ वह ठण्डी प्रकृतिवाले जीवोंको प्रिय है और दूसरे प्रकारकी प्रकृति- वालोंको अन्य प्रकारकी है । इसी प्रकार अधिक या अल्प परिमाणमें होने पर भी ऐसाही कहा जा सकता है ॥ १५ ॥ यही बात शीत, धन, स्त्री, पुत्र, राज्य तथा अन्य विषयोंके सम्बन्ध- में भी है । आप महाराज मुक्ताचूड़को ही लीजिये । वे स्त्री, पुत्र, धन सभीसे सम्पन्न हैं ॥ १६ ॥ फिर भी नित्य क्यों चिन्तातुर रहते हैं तथा दूसरे लोग [ जिनके पास इतनी भोगसामग्री नहीं है ] क्यों चिन्ता नहीं करते । और यह जो सुख देनेवाले भोग हैं वे भी अनन्त तो किसीके पास हो नहीं सकते ॥ १७ ॥