त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे न केनचित्तदखिलं प्राप्तं यस्मात् सुखं भवेत् । यत्किञ्चिल्लाभतो यस्मात् सुखं तत्रापि संशृणु ॥ १८ ॥ न तत् सुखं भवेन्नाथ यतो दुःखविमिश्रितम् । दुःखन्तु द्विविधं प्रोक्तं बाह्यमान्तरमित्यपि ॥ १९ ॥ बाह्यं शरीरसम्भूतं धातुदोषादिसम्भवम् । आन्तरं मानसं प्रोक्तं तच्च वाञ्छासमुद्भवम् ॥ २० ॥ महत्तरं मानसं स्याद्येन ग्रस्तमिदं जगत् । वाञ्छैव दुःखविटपिबीजं सुदृढशक्तिकम् ॥ २१ ॥ यया किङ्करतां प्राप्ताः कुर्वन्त्येव दिवानिशम् । इन्द्रादयोऽपि विबुधाः स्वनिवासाः सदोदिताः ॥ २२ ॥ सुखं वाञ्छावशेषेऽपि यदस्ति नृपसम्भव । तद्दुःखमेव जानीहि यत् कृमिष्वपि सम्भवेत् ॥ २३ ॥ वे पूरे तो किसीको भी प्राप्त नहीं हुए, जिससे कि उसे सुख मिल जाता । [ यदि आप कहें कि ] थोड़े मिलनेसे भी सुखतो होता ही है, तो इसपर आप मेरी बात सुनिये ॥ १८ ॥ हे नाथ ! वह तो सुख है ही नहीं, क्योंकि उसमें दुःख मिला हुआ है । दुःख दो प्रकारका कहा गया है-बाह्य और आन्तर ॥ १९ ॥ धातुओंके दोषादिसे होनेवाला शरीरजनित दुःख बाह्य होता है और मानस दुःख आन्तर कहलाता है । वह कामनाओंके कारण हुआ करता है ॥ २० ॥ इनमें मानस दुःख अधिक बड़ा है, जिसने कि इस सारे जगत्को ग्रस रखा है । दुःखरूपी वृक्षका बड़ा शक्तिशाली बीज कामना ही तो है ॥ २१ ॥ इस कामनाकी दासता स्वीकार करनेसे ही स्वर्गमें रहनेवाले बड़े वैभवशाली इन्द्रादि देवताभी रात-दिन कर्म करनेमें ही लगे रहते हैं ॥ २२ ॥ राजकुमार ! कामनाके रहते हुए भी जो सुख होता है उसे तो आप दुःख ही समझें। वह सुख तो कीड़े-मकोड़ोंमें भी संभव हो सकता है ॥ २३ ॥