भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

चतुर्थोऽध्यायः । ४१ वरं तिर्यक्कीटकृमिप्रभृतीनां सुखन्तु यत् । स्वल्पवाञ्छासम्मिलितं नृणां किं स्यात् सुखं वद ॥ २४ ॥ वाञ्छाशतसमाविष्टो यदि किञ्चिदुपेत्य तु । सुखी भवेदिह तदा को हि न स्यात् सुखी वद ॥ २५ ॥ अखिलाङ्गे वह्निदग्धे सूक्ष्मपाटीरबिन्दुना । यदि शीललदेहः स्यात्तदा सोऽपि सुखी भवेत् ॥ २६ ॥ प्रियायाः सम्परिष्वङ्गात् सुखं प्राप्नोति वै नरः । तत्रैवाङ्गस्य विषमन्धाद् दुःखं भवेन्ननु ॥ २७ ॥ रत्यावेशात् परिश्रान्तिः सर्वेषां जायते किल । अनन्तरं भारवाहपशोरिव परिश्रमः ॥ २८ ॥ कथं पश्यसि तत् सौख्यं नाथैतन्मे समुच्यताम् । यावत् सुखं प्रियासङ्गे नाडीसंघट्टसम्भवम् ॥ २९ ॥ तदास्ति तावन्न किमु शुनामस्तीह तद्वद । कीड़े, मकोड़े और तिर्यक योनिके प्राणियोंका सुख तो थोड़ी ही कामनाओंसे युक्त होता है, इसलिये वह तो अच्छा है। परन्तु बताइये, मनुष्यको क्या सुख हो सकता है, क्योंकि उसके सुखके साथ तो सैकड़ों इच्छाएँ लगी हुई हैं। यदि उनमेंसे कुछकी पूर्ति होनेसे ही वह सुखी हो सकता है तब तो बताओ, ऐसा कौन है जो सुखी न हो ॥२४-२५॥ जिसका सारा शरीर अग्निसे जल रहाहो उसे यदि छोटी-सी चन्दन- की बूँदसे शारीरिक शीतलताकी उपलब्धि हो सके तो वह (कामनाकुल) पुरुषभी सुखी हो सकता है ॥ २६ ॥ कहते हैं कि प्रियतमाके आलिंगनसे पुरुषको सुख मिलता है। परन्तु वहाँ भी शरीरके कसे जानेसे तो दुःख भी रहता ही है ॥ २७ ॥ कामक्रीडाके आवेशसे भी सबको थकान होती ही है। उसके अन्तमें उसे भारवाही पशुके समान श्रम जान पड़ता है ॥ २८ ॥ नाथ ! मुझे बतलाइये तो, आपको उसमें सुख कैसे दिखायी देता है। नाड़ियोंके घर्षणसे जितना सुख किसीको अपनी प्रियतमाके सहवाससे मिलता है, बतलाइये, उतना ही क्या कुत्तेको कुत्तीके सहवास- से नहीं मिलता ? ॥ २९-३० पू० ॥