त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यत्ततो ह्यतिरिक्तं ते दृष्टसौन्दर्यसम्भवम् ॥ ३० ॥ तत् केवलाभिमानोत्थं स्वाप्नस्त्रीसङ्गमे यथा । पुरा कश्चिद्राजसुतो मन्मथाधिकसुन्दरः ॥ ३१ ॥ काञ्चित् सुरूपिणीं प्राप्तः स्त्रियं सर्वमनोहराम् । अत्यन्तमनुरक्तः स तस्यां राजकुमारकः ॥ ३२ ॥ सा त्वन्यस्मिन् राजसुत भृत्ये संसक्तमानसा । स भृत्यो राजपुत्रं तं वञ्चयामास युक्तितः ॥ ३३ ॥ मदिरां मोहनार्थाय तस्मै दत्त्वातिमात्रकम् । ततो मदान्धाय चेटीं काञ्चित् प्रेष्य कुरूपिणीम् ॥ ३४ ॥ बुभुजे तां तस्य पत्नीं सर्वलोकैकसुन्दरीम् ' एवमेव चिरं तत्र मदान्धो नृपतेः सुतः ॥ ३५ ॥ प्रत्यहं चेटिकां गच्छन् स्वात्मानं सममंसत । धन्योऽहमीदृशीं लोकसुन्दरीं प्राणप्रेयसीम् ॥ ३६ ॥ उपगच्छाम्यहं नित्यं न मेऽस्ति सदृशः क्वचित् । यदि कहो कि प्रियतमाका सौन्दर्य देखनेसे उसकी अपेक्षा अधिक सुख होता है तो वह स्वप्नके स्त्रीसङ्गमके समान केवल माना हुआ ही है ॥ ३० उ०-३१ पू० ॥ प्राचीन समयकी बात है कोई राजकुमार कामदेवसे भी अधिक सुन्दर था। उसे स्त्री भी अत्यन्त रूपवती और सब प्रकार मनको हरनेवाली प्राप्त हुई थी। तथा उसका उसमें अनुराग भी बहुत था ॥ ३१ उ०-३२ ॥ किन्तु उस स्त्रीका चित्त राजकुमारके एक सेवकमें लगा हुआ था। वह सेवक राजकुमारको एक युक्तिद्वारा धोखा दिया करता था ॥ ३३ ॥ उसे मदोन्मत्त करनेके लिये वह बहुत-सी मदिरा पिला देता। और जब वह नशेमें चूर हो जाता तो उसके पास एक कुरूपा दासीको भेज देता तथा स्वयं उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें एकमात्र सुन्दरी स्त्रीके साथ सम्भोग करता ॥ ३४-३५ पू० ॥ इसी प्रकार वह मदोन्मत्त राजकुमार बहुत समयतक नित्यप्रति उस दासीके साथ सहवास करते हुए यही समझता रहा कि मैं नित्य