भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः। ४३ एवं वृत्ते चिरे काले कदाचिद्दैवयोगतः ॥ ३७ ॥ भृत्यो निधाय पानं स कार्ये चात्यन्तिके ययौ । अथ राजकुमारस्तत् पानं नात्यन्तिकं पपौ ॥ ३८ ॥ निमित्ततो ययौ शीघ्रं रत्युत्सुकितमानसः । शयनीयं मनः कान्तं सर्वभोगर्द्धिसंयुतम् ॥ ३९ ॥ शचीगृहं देवपतिरिव नन्दनसंस्थितम् । परार्द्धार्च्यपर्यङ्कगतां तां चेटीमुपसङ्गतः ॥ ४० ॥ कामवेगेन विवशो बुभुजेऽत्यन्तहर्षतः । उपलब्ध्याथ रत्यन्ते चेटीं तां विकृताकृतिम् ॥ ४१ ॥ शङ्कितोऽमर्षितश्चापि किमेतदिति चिन्तयन् । क्व सा मम प्रियतमेत्येवं तामन्वपृच्छत ॥ ४२ ॥ पृष्टैवं तेन सा चेटी विमदन्तं निशम्य तु । भीता न किञ्चितं ग्राह वेपमाना तदा ततः ॥ ४३ ॥ ऐसी त्रिलोकसुन्दरी प्राणप्रियाका उपभोग करता हूँ, इसलिये धन्य हूँ। मेरे समान कहीं कोई नहीं है ॥ ३५ उ०-३७ पू० ॥ बहुत दिनों तक ऐसा ही होता रहा। तब किसी दिन कोई विशेष कार्य होनेके कारण वह सेवक मदिरा रखकर चला गया। तथा राजकुमार ने भी उस दिन किसी निमित्तसे अधिक मद्य नहीं पी तथा भोग-वासना से आतुर हो शीघ्र ही वह अपने विलासभवनमें गया ॥ ३७ उ० ३९ पू० ॥ वह भवन बड़ा ही सुन्दर, मनको प्रिय लगनेवाला, सम्पूर्ण भोग- सामग्रियोंसे सम्पन्न था। देवराज इन्द्र जिस प्रकार नन्दनवनमें स्थित शचीके भवनमें जाते हैं उसीप्रकार वह उस भवनमें गया और वहाँ बहु- मूल्य पलंगपर पौढ़ी हुई दासीके साथ समागम करने लगा ॥३९ उ०-४०॥ कामवेगसे व्यथित होनेके कारण वह बड़े हर्षसे उसके साथ सम्भोग करता रहा। सम्भोगके अन्तमें उस कुरूपा दासीको देखकर उसे शंका हुई और कुछ रोषके साथ यह सोचते हुए कि यह सब क्या हो रहा है उसने उससे पूछा, “मेरी वह प्रियतमा कहाँ है ?”॥ ४१-४२ ॥ उसके इस प्रकार प्रश्न करने पर जब दासीने देखा कि आज तो राजकुमार सचेत है तो वह डरकर काँपने लगी और चुप हो गई ॥ ४३ ॥